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Sunday, June 26, 2011

कनाडा से भारत तक......'बेशर्मी मोर्चा'

कनाडा के एक पुलिस अधिकारी द्वारा विश्वविद्यालयों की छात्राओं को दी गई एक सलाह की 'यदि लडकियां बलात्कार से बचना चाहती है तो उन्हें slut'(वैश्या) जैसे कपड़ों से परहेज करना होगा' के बाद दुनिया भर में इस पर जबरदस्त प्रतिक्रिया हई है.कनाडा,अमेरिका,ऑस्ट्रेलिया सहित अनेक देशों में महिलाओं ने 'slutwalk ' का आयोजन किया है जिसमे पुरुषों ने भी अच्छी भागीदारी की है.इन महिलाओं के अनुसार इन प्रदर्शनों के जरिये वे यह बताना चाहती है की बलात्कार जैसे अपराध कुछ पुरुषों की महिला विरोधी लम्पट मानसिकता का नतीजा है और उन्हें अपने
 मन मुताबिक कपडे पहनने का हक़ है.
           अब भारत में भी इस तरह कि ही  रैली के लिए तैयारियां चल रही है.डी.यु. में द्वितीय वर्ष की पत्रकारिता की छात्रा उमंग सभरवाल ने फेसबुक  के जरिये दिल्ली की छात्राओं से इस तरह की रैली में शामिल होने का आह्वान  किया है.इस  रैली का नाम उन्होंने '
बेशर्मी  
मोर्चा' रखा है.वही मुंबई में एक गैर सरकारी संस्था ने भी जुलाई के अंतिम सप्ताह में एक ऐसे ही विरोध प्रदर्शन का आयोजन करने का फैसला किया है.
     महिलाओं के लिए  ये कोई नई बात नहीं है की उनके कपड़ों से ही उनके चरित्र को आँका  जाता है.पढ़े लिखे पुरुषों में से भी कईयों की ये ही सोच है की महिलाओं के 'भड़कीले' वस्त्र पुरुषों की यौन उत्तेजना के लिए उत्प्रेरक का काम करते है जिससे की पुरुष खुद पर काबू नहीं रख पाते.वहीं कुछ महिलाओं का भी मानना है की जो महिलायें छोटे कपडे पहनती है उन्हें खुद से सती सावित्री  जैसे व्यवहार किये जाने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए.
            परन्तु मनोविज्ञान की माने तो बलात्कार जैसे अपराधों के पीछे दैहिक आकर्षण उतना बड़ा कारक नहीं है जितनी की पुरुषों की सदियों पुरानी वही सोच जो महिलाओं को हर हाल में दबाएँ रखना चाहती है.साथ ह़ी कई बार के अध्ययनओं में ये बात सामने आ चुकी है की बलात्कार की शिकार ज्यादातर वे ह़ी महिलायें होती है जो साड़ी या सलवार  सूट जैसे कपड़ों में होती है.कम कपड़ों वाला तर्क वैसे भी बहुत कमजोर है क्योंकि एक ८० साल की बुजुर्ग से लेकर ६ माह की बची तक कोई भी महिला आज के माहौल में सुरक्षित नहीं है.लेकिन फिर भी चाहे विकसित समझे जाने वाले पश्चमी देश हो या पिछड़े माने जाने वाले इस्लामिक राष्ट्र हो या फिर हों विकासशील भारत जैसे देश, महिलाओं को हर जगह पुरुषों की शिकारी के बजे शिकार को ह़ी दोषी ठहराने वाली मानसिकता का सामना करना ह़ी पड़ता है.
              इन सब बातों का विरोध महिलायें शुरू से करती भी रही है.हमारे देश में भी बहुत कुछ  इस बारे में लिखा जा रहा है.कुछ साल पहले दक्षिण भारत के एक शहर (नाम याद नहीं आ रहा) में कुछ इसी तरह के विरोध प्रदर्शन का आयोजन एक गैर सरकारी संस्था ने ह़ी किया था.जिसमे शहर की सबसे व्यस्त सड़कों पर लडकियां अलग अलग जगहों पर खडी हो जाती और वहाँ से गुजरने वाले लड़कों  को उसी तरह से घूरती जैसे लड़के लड़कियों को घूरते है.इसका मकसद लड़कों द्वारा लड़कियों को घूरे जाने की गंदी आदत का विरोध करना था क्योंकि इससे वे असहज महसूस करती है.इसके अलावा तहलका की निशा सुसन द्वारा श्रीराम सेना नामक एक हिंदूवादी संगठन के विरोध में चलाया गया एक कैम्पेन  भी बहत चर्चित रहा था.मंगलौर के एक पब  में लड़कियों की पिटाई करने वाले इस संगठन ने निशा के अभियान के बाद अपने आगे के ऐसे ही 'अभियान' वापस ले लिए थे.निशा का कैम्पेन  जिस तरह  विवादों में आ गया था वैसे ह़ी उमंग के द्वारा इस रैली का नाम बेशर्मी
मोर्चा रखे जाने पर कुछ लोगों ने अभी से आपत्ति करनी शुरू कर दी है.परन्तु उमंग का कहना है की ये नाम उन्होंने एक ग्रुप मीटिंग के बाद एकमत से चुना है ताकि लोग समझ जाए की हमारा मकसद क्या है और लड़कियों के छोटे कपड़ों का मतलब उनकी 'हाँ' न समझा जाये.
                मुझे लगता है की जब किसी भी गलत बात का विरोध करने के पारंपरिक तरीके काम न करे तो कुछ हटकर कदम उठाना  गलत नहीं है.बस ये ख़याल रहे की माहौल किस बुराई के खिलाफ बनाया जा रहा है.अभी भी जहाँ भी इस तरह के प्रदर्शन हो रहे है वहाँ इस मसले पर गंभीर  बहस  छिड गई है.लेकिन हमारे यहाँ कुछ लोग अभी से इसे प्रचार के भूखे लोगों का हथकंडा,संस्कृति के खिलाफ आदि मानने लगे है.पर चाहे जो हो कोशिश ये ह़ी होनी चाहिए की बहस इन अपराधों और इनके लिए महिलाओं को ह़ी जिम्मेदार  ठहराने वाली प्रवृति  पर ह़ी केन्द्रित होनी चाहिए.
                        कुछ महिलाओं को लग सकता है की इस तरह के विरोध प्रदर्शनों से पुरुषों की मानसिकता में कोई परिवर्तन नहीं आने वाला है.ये बात सही भी है लेकिन इस बहाने जो बहस चलती है तो लोग थोडा बहुत सोचने को मजबूर होते है.और मान लेते है की पुरुषों पर कोई फर्क नहीं पड़ने  वाला तो भी कम से कम वो महिलाएं तो इस बारे में गंभीर होंगी जिन्होंने पुरुषों की इन आदतों को सामान्य मान लिया है.
                     जहाँ तक बात है विरोध के तरीके की तो ये एक अच्छे उद्देश्य के लिए ह़ी किया जा रहा है.और पुरुषों की आपत्ति की  असली वजह विरोध  का तरीका नहीं है दरअसल उन्हें इन सब सवालों से ह़ी परेशानी है जो महिलायें उठा रही है और कम से कम इन बातों का विरोध महिलायें किसी भी तरीके से कर के देख ले,कुछ पुरुषों की गालियाँ तो उन्हें पड़ेंगी ह़ी,फिर चाहे वो कोई छात्रा हो या कोई साहित्यकार.यहाँ नेट पर भी इस तरह के उदाहरण भरे पड़े है.वही कुछ महिलाओं का कहना है की विरोध का ये तरीका अपनाने पर तो बलात्कार जैसा अपराध, जिस पर गंभीर बहस होनी चाहिए वो बहुत हल्केपन में लिया जायेगा.लेकिन ऐसा हैं नहीं क्योंकि  हलके में तो इसे अभी समाज ले रहा है.यदी हमारा समाज ये मानता है की बलात्कार और छेडखानी का कारण महिलाओं के छोटे कपडे ह़ी है तो इसका मतलब पहले से ह़ी महिलाओं के प्रति इन अपराधों को हलके में लिया जा रहा है.और इसी का तो विरोध किया जा रहा है. ऐसे विरोध प्रदर्शन यदि एक बहस का माहौल तैयार करते है तो इसमें बुराई क्या है.

Monday, May 9, 2011

हमारे जमाने में....

पहले ही बता दूँ की ना तो ये कोई गंभीर लेख है और ना ही किसी भी तरह से शिक्षाप्रद या जानकारीपरक है.ये केवल अपने अनुभव लिखने की तरह है ताकि आपको बाद में कोई निराशा ना हो और इसी बात को मेरे आगे के लेखों पर भी लागू समझिये.
     बुजुर्गों  की नई पीढी से यह शिकायत आम है की युवाओं  के पास उनके लिए समय नहीं है या वे उनकी बात नहीं मानते.एक हद्द तक उनकी ये बात सही है पर कई बार लगता है की वो ही  हमारी बात नहीं समझते.पर कुछ भी हो जब आप अपना थोडा समय उन्हें देते है तो कई बार बहुत सी रोचक बातें भी जानने को मिलती है.अक्सर उनकी ये बातें 'हमारे जमाने में...'से शुरू होती है.खासकर जब बातें गाँव से जुडी होती है.
                    वैसे तो हम शहरी लोगों के लिए गाँव की बहुत सी बातें आज भी नई ही होंगी लेकिन गाँव में भी पहले की तुलना में अब बहुत बदलाव आ चूका है.मेरे दादाजी जो की एक सेवानिवृत फौजी है कई बार इस बारे में बताते है.हम लोग तीस साल से ही शहर में रह रहे हैं यानी मेरे जनम से कुछ ही साल पहले.
                 सबसे पहले तो उनकी बातें शुरू होंगी आजकल के युवाओं के आलसीपन और कामचोरी को लेकर जिससे कई बार मैं सहमत नहीं हो पता हूँ लेकिन शारीरिक श्रम की जहां तक बात है वो लगता है की अब कम हुआ है कारण चाहे जो हो.उनके अनुसार पहले लड़के कुश्ती,पहलवानी में तो रूचि रखते ही थे बल्कि घर के कामों में भी पूरा हाथ बंटाते थे.एक सामान्य कद काठी का लड़का भी कई किलो मीटर दूर कुँए से ५-५ मटके पानी के ले आता था.तीन सर पर और दो कन्धों पर.बीमारियाँ बहुत कम होती थी और छोटी मोटी बीमारीओं की लोग परवाह नहीं करते थे.ये नहीं की आजकल के लड़के लड़कियों की तरह जरा मुहं में छाले हुए नहीं की हफ्ते भर के लिए मौन व्रत धारण कर बैठ गए.
                       दूसरी इनकी बातें होंगी आजकल की महंगाई को लेकर की कैसे पहले केवल 20  रुपये में महीने भर से ज्यादा का पूरे घर का राशन आ जाता था जबकि आज एक किलो चीनी तक नहीं आती.ठीक है की उस जमाने में 20  रुपये भी बहुत होते थे लेकिन ये सब सुनने में बड़ा अच्छा लगता है इसीलिए मैं  अपनी तरफ से खोद खोदकर भी ऐसी बातें पूछता हूँ.तीसरी बात शादियों को लेकर. एक बार दादाजी ने बताया की जब वे छोटे थे तो उनके पिताजी ने गाँव के एक गरीब की लड़की की शादी में 35  रुपये और कुछ कपडे दिए तो आस पास के गाँव में हंगामा मच गया था.पहले बारातें  आज की तरह एक दिन में  ही खा पीकर वापस  नहीं हो लेती थी बल्कि चार चार दिनों तक रुका करती  थी. जरा सोचिये लड़की वालों का क्या होता होगा.उस समय जब किसीके दहेज़ में साइकिल आ जाती तो लोग दूर दूर से उसे देखने के लिए आते.जिस लड़के की शादी में साइकिल आती वो वो उसे रोज धोता,साफ़ करता मगर महीनों तक इसे घर से बाहर नहीं निकालता.ये ही हाल तब था जब शुरू में रेडियो आया.जिस व्यक्ति के पास शुरू शुरू में रेडियो आ गया वो किसी से सीधे मुंह बात ही नहीं करता था.रेडियो को कंधे पर लटकाने के लिए वो एक लम्बी सी सुतली का प्रयोग करता और पूरे गाँव में शान से घूमता.अकड ऐसी की मानो रेडियो का आविष्कार ही इसीने किया हो.महिलाओं और दलितों की स्थिति में जो कुछ उन्होंने बताया मुझे नहीं लगता की आज भी इसमें कोई ख़ास अंतर आया है.इनके साथ भेदभाव अभी भी जारी है.
                        और ऐसा नहीं है की केवल बुजुर्गों के पास ही सुनाने को ये किस्से हो.हमारे माता पिता के पास भी 'अपने जमाने' के बारे में बताने को बहुत कुछ है.इनमे ज्यादातर बातें ७० के दशक की फिल्मों और उनके प्रति लोगों की दीवानगी की होती है.मेरे पापा बताते है की कैसे बच्चन की नई फिल्में देखने ले लिए वे दिनभर सिनेमाघरों की लइनों में खड़े रहते थे और कई कई बार तो एक ही फिल्म को दिन में दो या तीन बार भी देखते थे जैसे की दीवार और शराबी.उन्होंने बताया की साधारण शकल सूरत वाले राजेश खन्ना के प्रति जैसी दीवानगी लोगों खासकर के महिलाओं में हुआ करती थी वैसी फिर किसी हीरो को लेकर नहीं हुई(वास्तव में?).एक और बात जो मेरे लिए भी नई थी और कल ही मुझे पता चली की दिल्ली में एक बार लोकनायक जयप्रकाश नारायण की एक रैली को फ्लॉप कराने के लिए तत्कालीन सरकार ने राजकपूर की 'बोबी' को मुंबई से प्रिंट मंगवाकर आनन् फानन में दूरदर्शन पर प्रदर्शित कर दिया ताकि इसमें कम से कम लोग पहुंचे.बातें कई है पर अब ज़रा 'हमारे जमाने' की बातें भी तो कर ले.
                         हमारे जमाने में(बड़ा माझा आता है ये कहने में.)मुझे याद है कैसे एक रुपये की चार आइसक्रीम और चार पतंगें आया करती थी.त्योहारों का एक अलग ही माझा था.होली,दीवाली या संक्रांति पर जो हुल्लड़बाजी  देखने को मिलती थी अब कुछ महंगाई तो कुछ संयुक्त परिवारों के टूटने से सब फीका सा हो गया है.
                             टेलीविजन  से जुडी तो कई यादें है.शुरुआत में जब टी.वी. का नया नया दौर शुरू हुआ था तब मोहल्ले में हमारा दूसरा घर था जिसमें लकड़ी के शटर वाला टी.वी. था. शनिवार और रविवार को आने वाली ब्लैक &व्हाइट फिल्मों का लोग बेसब्री से इन्तजार करते थे.इनके बीच १५ मिनट का ब्रेक भी आता था जिसमे देश भक्ति गीत प्रसारित होते थे.तब दूरदर्शन पर एक प्रोग्राम आता था चिट्ठी-पत्री.इस प्रोग्राम को देखने के लिए भी मोहल्ले भर के बच्चे हमारे घर इकठ्ठा हो जाते थे.कई बार तो घर की साफ़ सफाई भी नहीं हो पाती थी.मम्मी बताती है की उस समय उन्हें एक ही कार्यक्रम सबसे अच्छा लगता था और वो था,डीडी का एतिहासिक ,जो कई बार आधे आधे घंटे तक भी चला करता था और जिसका कोई समय ही नहीं था,सोचिये कौनसा?
 जी हाँ.....
'रुकावट के लिए खेद है'
हा हा हा...कुछ याद आया?
इस कार्यक्रम के दौरान ही उन्हें कुछ चैन मिलता था.
                            एक और अंतर जो मुझे देखने को मिलता है वो है आजकल के बच्चे और उनकी परवरिश का तरीका.आजकल के बच्चे जहां विडियो गेम,मोबाइल और कंप्यूटर के शौक़ीन है,indoor गेम्स  खेलते है,हल्क और स्पाईडरमैन  के पोस्टर्स इनके कमरे में लगे होते है(इनके कमरा भी अलग होता है.)जबकि हमारे जमाने में ये सब इतना नहीं था(मतलब की फीलिंग ही दूसरी होती है.).पहले खुले मैदान बहुत थे.पक्की सड़कें नहीं थी.बच्चे बाहर गलियों में खेल सकते थे.आजकल पार्क भले ही बन गए है लेकिन वहाँ भी बौल  लाना मना है,साइकिल लाना मना है,घास पर चलना मना है जैसी हिदायतें लिखी रहती है.पहले बहुत कम बच्चे ऐसे दीखते थे जिनकी आँखों पर मोटे लेंस वाले चश्मे लगे हो.लगता है आजकल वाले ज्यादा ही पढ़ेसरे हो गए है.
                      आजकल की माएँ  भी बहुत बदल गई है(इसका मतलब ये नहीं की बच्चों के प्रति प्यार कम या ज्यादा हुआ हैं ).ये बात तो है की आजकल की सुपरमोम की तरह पहले की माएं बच्चों की छोटी मोटी बातों को उतनी गहराई से नहीं समझ पाती थी जो की सूचनाओं के ज्ञान की वजह से संभव हुआ है.ऐसा लगता हैं की आज के बच्चों की जिद पूरी करने को माँ बाप  खुद ही आगे रहते है.पर हमारे जमाने में ऐसा नहीं था.
                      बेचारे छोटे छोटे बच्चे थके  हारे पसीने से लथपथ स्कूल से लौटते और मम्मी जी गेट पर ही खड़ी मिलती,आते ही पहला सवाल-
होमवर्क मिला ??
हा हा हा....
बेचारे बच्चे की हालत खराब.लेकिन बात यही ख़तम नहीं होती, आगे भी-चल जल्दी से कपडे बदल,खाना  खा और पढने बैठ जा.आने दे तेरे पापा को बहुत बिगड़ गया है.
आजकल के बच्चों जरा कल्पना करके देखो.
                        और सोचकर देखिये आज से तीस चालीस साल बाद के बच्चों को हम आज की किन किन बातों के बारे में बताएँगे जिन पर वो आश्चर्य करेंगे.जब सब कुछ हमारे सामने ही इतनी तेजी से बदल रहा है.याद है मोटोरोला के वो ऐन्तीने वाले भारी भरकम हैण्ड सेट्स जब इन कमिंग  के भी ५-५,६-६ रुपये लगा करते थे.आज जिस तरह से पानी की किल्लत हो रही है कही ऐसा तो नहीं की जब हम इस जमाने के बारे में बच्चों को बताएं की कभी हम होली भी पानी से खेला करते थे और वो विश्वास ही न करे. 
                  
 
 
 
 
 
 
 
              
 

Monday, May 2, 2011

.....क्योंकि बहुत कुछ यहाँ 'फालतू' ही है.

एक नई फिल्म देखी, नाम है 'फालतू'.इस फिल्म में युवाओं को पढाई फालतू लगती है.फिल्म में ज्यादातर गाने फालतू में डाले गये है.एक्टिंग और निर्देशन दोनों फालतू टाईप के है.ऐसे निर्माता निर्देशकों को लगता है कि दर्शकों के पास बहुत सारा फालतू का समय और पैसा है.पर आजकल और भी बहुत कुछ फालतू का हो रहा है और माना जा रहा है.

आजकल सरकार को आए दिन अलग अलग माँगों के लिए होने वाले प्रदर्शन और बंद फालतू के लग रहे है वहीं जनता को सरकार की आपत्तियाँ फालतू लग रही है.नक्सलियों और माओवादियों को पूरा लोकतंत्र ही फालतू का लग रहा है.आतंकवादियों को इंसान फालतू नजर आते है वहीं आत्महत्या करने वालों को अपना जीवन ही फालतू नजर आता है.

महिलाओं को लगता है कि उन पर पुरूषों ने कई प्रतिबंध फालतू के लगा दिये है जिन पर वो सवाल उठा रही है वहीं पुरुषों को इनके सारे सवाल ही फालतू के नजर आ रहे है.

गभीर लिखने वालों को हल्का फुल्का लेखन फालतू लगता है वही हल्का फुल्का लिखने वालों को लगता है जब सरल भाषा में समझाया जा सकता है तो फालतू में गंभीर क्यों लिखे.युवाओं को तो हिंदी भाषा भी फालतू की लगने लगी है. तो बच्चों को ईमानदारी और सादगी की सीख ही फालतू लगती है.

कुछ लोगों को हेलमेट पहनने का नियम फालतू लगता है तो कहीं बिगडेल नशेडी अमीरजादों को कार ड्राइव करते समय फुटपाथ पर सोये हुए गरीब ही फालतू नजर आते है .पुलिस वालों को जनता की कंपलेन फालतू नजर आती है.कई लोग जिन्हें अपने शरीर की चर्बी फालतू नजर आती है जिम जाते है तो कईयों को जीभ पर कंट्रोल करना फालतू लगता है,खा खा के इनकी हालत ऐसी हो गई है कि आधी सडक फालतू में घेर के चलते है कल को हो सकता है पीठ पर एक तख्ती लगानी पडे-जगह मिलने पर ही साइड दी जाएगी.

मेरे दादाजी को अखबार में विज्ञापन फालतू लगते है तो दादीजी को राशिफल के कॉलम के अलावा पूरा अखबार ही फालतू लगता है.वृद्धाश्रमों की बढती संख्या और बागबान जैसी फिल्में देखकर तो लगता है औलादों को अपने बुजुर्ग माँ बाप भी फालतू लगने लगे है.तो कई लोगों को बेटियों को पढाना ही फालतू लगता है.

यहाँ ब्लॉगिंग में भी कई लोग धर्म के नाम पर झगड रहे है वही कईयों को लगता है कि ये झगडे ही फालतू के है इनसे दूर रहा जाए जबकि इन झगडने वालों को लगता है जो हमारे बीच बोल ही नहीं रहा वो ब्लॉगर ही फालतू का है.लीजिए हमने भी एक फालतू की चेप ही दी.इसे झेल जाइये.

Tuesday, April 26, 2011

MLM का बढता चलन

कुछ समय पहले हमारे एक किरायेदार भैया कई दिनों से पीछे पडे हुए थे एक स्कीम को लेकर.आप सात हजार रुपये दीजिए आपका रजिस्ट्रेशन एशिया की टॉप फाइव कंपनियों में से एक हमारी कंपनी में हो जाएगा इसके बाद आपको पाँच मेंबर जोडने होंगे और प्रत्येक ज्वायनिंग पर आपको तीन तीन सौ के चैक मिलेंगे फिर उन मेंबरों को भी 5-5 मेंबर जोडने पडेंगे और जैसे जैसे ये चैन बढती जाएगी आपको फायदा मिलता जाएगा.सारा हिसाब समझाया कि कैसे कुछ ही महीने में आप करोडपति बन जाएँगे.लेकिन मेंने इन सबके बारे में पहले भी सुन रखा था सो किसी तरह टालता रहा.इस चेन सिस्टम को एम एल एम यानी मल्टी लेवल मार्केटिंग कहते है आजकल ऐसी कंपनियाँ लगभग हर शहर में फैलती जा रही है.

ऐसे प्लान सुनने में बडे आकर्षक लगते है और समझाने वालों की भी दाद देनी पडेगी वो बताते ही इस तरह हैं कि आदमी चाहें जितना समझदार हो एक बार लालच के चलते इनके झाँसे में आ ही जाता है यहाँ तक की कई लोग लालच में आकर पैसा ब्याज पर लेकर भी इन स्कीमों में लगा देते है.लेकिन शुरू में तो कुछ फायदा होता है पर बाद में पता चलता है या तो कंपनी ही भाग गई या काम ही ठप्प पड गया यानी मेंबर ही नहीं मिल रहे.जितनी रकम लगाई उसमें से आधी ही वापस मिली बाकी डूब गई.यही नहीं कई कंपनियाँ तो सदस्यता नवीनीकरण के नाम पर फिर से कुछ रकम झटक लेती है.कई कंपनियों की धोखाधडी और रातोंरात भागने की खबरें आ चुकी है लेकिन फिर भी लोग सबक लेने को तैयार नहीं हैं.
ऐसा नहीं है सभी कंपनियाँ फर्जी ही है कुछ कंपनियाँ लंबे समय से जमी भी हुई है जो सदस्यता राशि जमा कर अपने उत्पाद बेचने के लिये भी अपने मेंबरों को देती है जिन पर उन्हें कुछ कमीशन मिलेगा लेकिन ये प्रोडेक्ट बहुत महँगे होते है साथ ही रोजमर्रा में कम ही उपयोग में लाए जाते है यही कारण है कि कई लोग जो बहुत उत्साह से इनसे जुडते है बाद में उदासीन हो जाते है और अच्छी भली रकम गँवा बैठते है.ये एक तरीके से संबंध बिगाडू काम भी है कई लोग जो अपने मित्रों रिश्तेदारों को मेंबर बना लेते है वो खुद के साथ साथ दूसरों का भी नुकसान कराते है और इसी कारण कई बार संबंधों में खटास भी आ जाती है.जहाँ निवेश कम जोखिमपूर्ण और कंपनी विश्वसनीय हो वहाँ बात अलग है पर मेरा तो मानना है कि इन पचडों से बचना ही सही है वर्ना खाया पीया कुछ नहीं गिलास तोडा बारह आना.

.......तो फिर आप ही बताइये क्या करे?

लैंगिक असंतुलन और कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के जितने भी ऊपाय है उनमें लडकियों को आत्मनिर्भर बनाने,बेटा बेटी में अन्तर न करने,पुरुषों द्वारा महिलाओं का सम्मान करने,दहेज जैसी परंपरा को खत्म करने,बेटियों द्वारा माँ बाप की अर्थी को कंधा देने की परंपरा की शुरुआत करने जैसी बातों पर बल दिया जा रहा है.हमने तो लोगों को ये तक समझाते देखा है कितनी ही कल्पना चावलाओं और किरण बेदियों को हमने संसार में आने से रोक दिया.तो क्या इनमें महिलाओं की क्षमता,उन्हें 'खर्च' न समझकर 'कुमाउँ पुत्री' समझने और असमानता खत्म करने का आह्वान आपको नहीं दिखाई देता?
एक और मासूम सा प्रश्न बहन क्या केवल इसलिये चाहिये ताकि वो भाई को राखी बाँध सकें???भई वाह! वैसे बाता दूँ कि स्वार्थ स्वार्थ में फर्क होता है भाई को बहन की कमी महसूस हो रही है तो यह उसका एक स्नेहिल स्वार्थ है कोई भी भाई समझ सकता है जिसकी बहन न हो.कलाई सूनी रह जाने का प्रयोग प्रतीकात्मक है .


अभिशाप नहीं वरदान है,बेटा बेटी एक समान,अजन्मी बेटी की पुकार जैसे नारो द्वारा आम आदमी तक ये ही बात पहुँचाई जा रही है.उँची जाति वाले लडके जो लडकियों को दुत्कारते रहे है उनका घमँड अब टूट रहा है कुछ समय पहले किरन बेदी ने भी लडकियों के एक समूह से ये बात कही थी.लेकिन अब मैं कह रहा हूँ तो इसका कोई दूसरा ही अर्थ लिया जा रहा है.
इतिहास में लडकियों की संख्या कम होने पर बहुपति प्रथा,अनैतिक व्यापार,बाल यौन शोषण आदि बढे है.चीन में हाल ही में जब लडकियों की संख्या अचानक से बेहद कम होने लगी तो वहाँ भी बलात्कार,यौन शोषण,अपहरण आदि घटनाओं में वृद्धि हो गई और वहाँ परिवार नियोजन के सख्त उपाय किये गये.ये तथ्य सच है.और प्राकृतिक असंतुलन व मानवता के खत्म होने की ही निशानी है.चलिये ये तथ्य न रखें तो आप ही बताइये आम आदमी को ये बात कैसे समझाऐ?इतना भर कह देने से काम नहीं चलेगा कि नेचुरल इंबैलेंस का खतरा है और न ही उसके समझ में आएगा.
फिर भी फिर भी आपकी बात समझ रहा हूँ.आपका कहना है कि इन तथ्यों को रखने से समाज में एक गलत संदेश जा रहा है तो ये मेरे लिये भी सोचने का विषय है कि कैसे.मगर आप रूकिये तो सही, सुनिये तो सही आप तो मैंने कुछ कहा और पहले ही अपने हिसाब से तय करने बैठ गये कि इसका मतलब ये और उसका मतलब वो.तो आप ही बताएँ हम अपनी बात कैसे कहे?