Tuesday, December 20, 2011

नैतिकता:एक प्रशन यहाँ भी ...


आजकल ब्लॉगजगत में नैतिकता और अनैतिकता को लेकर बहस का सीजन चल रहा है.सोचा कई दिनों से मन में कुलबुला रहे प्रश्नों को आपके सामने रखने का येही सही समय हो.वैसे भी आजकल समय कम ही मिल पता है,यहाँ तक की रविवार को भी आजकल तो आधा समय काम ही करना पड़ता है और कुछ सप्ताह और ऐसा ही चलेगा.लेकिन आज एक बहाना बनाकर छुट्टी ले ही ली.या यूँ कह लें की छोटे से कारण को एक बड़ा कारण बता दिया  (अनैतिकता) .क्या करें आराम ही नहीं मिल पाता.तबीयत इतनी भी खराब नहीं की काम ही न कर सकूँ.खैर ये आदत तो मैं आने वाले समय में सुधार ही लूँगा.  लेकिन यहाँ मेरा सवाल दूसरा है.
                   वैसे तो मैं शुरू से ही मानता रहा हूँ की व्यापार की तुलना में नौकरी करना न सिर्फ कठिन है बल्कि कई बार इसमें आपको अपने आताम्सम्मान को भी गिरवी रखना पड़ता है चाहे नौकरी सरकारी हो या प्राइवेट और चाहे  आप कितने ही बड़े पद पर क्यों न हो. खासकर तब जब आप पर हुकुम चलने वाला या आपको डांटने वाला आपकी तुलना में एक बुरा व्यक्ति हो जबकि  आपको कभी भी खुद आपके मां बाप ने उस तरह से ना डांटा हो.हालांकि समय के साथ ये बात तो समझ में आ गई की नौकरी में हमेशा ऐसा ही हो ये जरुरी नहीं.और जो आपको डांट रहा है वो जरुरी नहीं निजी दुश्मनी निकल रहा हो.उसे भी अपने से बड़े अधिकारीयों की दो बातें तो सुननी पड़ती है.वैसे भी लोग किसी भी तरह की नौकरी करना ही बंद कर दें तो सारी व्यवस्था ही बिगड़ जाए. एक समय ऐसा भी था जब ये माहौल था की यदि आपको कोई अच्छी सरकारी नौकरी चाहिए तो इसके लिए चेक और जैक दोनों का जुगाड़ होना ही चाहिए.हालांकि तभी मैंने ये बात भी सोच ली थी की चाहे जो हो जाए लेकीन मेर पास ऐसा कोई अवसर खुद चलकर भी आया तो भी मैं स्वीकार नहीं करूँगा चाहे जिन्दगी भर धक्के ही क्यों न खाने पड़े.हालांकि हालत इतनी खराब नहीं थी लेकिन हाँ ,बहुत अच्छी भी नहीं कह सकते की कुछ करने की जरुरत ही ना पड़े.
पर सवाल यहीं ख़तम हो गए हों ऐसा  नहीं है.कुछ दिनों पहले अपने एक पुराने दोस्त से लम्बे समय बाद मुलाकात हुई जो की एक निजी इंश्योरंस कंपनी में काम करता है.उसने शुरुआती बातचीत के बाद बताया की कई बार अपनी मोटी सेलेरी  के बावजूद उसे अपनी जॉब छोड़ देने का मन होता है.कारण सुनकर मैं खुद हैरान था क्योंकि स्कूल और कॉलेज के समय से  ही हमेशा बेफिक्र और मस्ती के मूड में रहने वाले अपने दोस्त को मैंने इससे पहले कभी इतनी गंभीर  बातें करते नहीं देखा.उसने बताया की कैसे उसे अपनी परफोर्मेंस  अच्छी रखने के लिए रोज सैकड़ों झूठ अपने clients  से बोलने पड़ते है.इन्स्योरंस  के बेनिफिट्स को बढ़ा चढ़ाकर बताना पड़ता है,कुछ जानकारियों और शर्तों को घुमा फिराकर बताना पड़ता है.यहाँ तक की कई बार तो सविंग्स पर ब्याज भी गलत केलकुलेट करके बताना पड़ता है.ग्राहक चाहे जितना पढ़ा लिखा हो पर इतनी बारीकियों को वह नहीं समझता.जब मैंने पुछा की आज तीन साल बाद उसे अचानक इस बात पर दुःख क्यों हुआ.तब उसने बताया की खुश तो वो अपने काम से पहले भी नहीं था लेकिन कुछ समय पहले जब उसने एक पालिसी करवाई और उसे पता चला की वह पालिसी udaipur  की किसी विधवा महिला के बच्चे के नाम से थी जिसके पास अपने दिवंगत फ़ौजी पति की पेंशन  के अलावा और कोई आय का साधन नहीं था.telephone  पर उस महिला को बीमा ऑफर करते हुए उसे ये बात  पता नहीं चल पाई क्योंकि उसने उससे बिना कोई ज्यादा जानकारी लिए ही उसे कन्विंस  कर लिया था लेकिन उसका फॉर्म भरते समय जब पता चला तो लगा जैसे सर पर घड़ों पानी पड़ गया हो.वो इसी बात पर परेशान था की न जाने उसने ऐसे ही और कितने ही लोगों को झूठे वायदे किये होंगे.
                 उसकी सारी बातें सुनकर मैं खुद भीतर से परेशान था.और उसे लघभग उन्ही सारे तर्कों(या बहाने कह लीजिये) से दिलासा दिया जिनसे मैं अपने मन को बहलाता रहा हूँ अलग अलग कंपनियों में कुछ सालों की अपनी नोकरियों के दौरान. हालांकि उसकी तुलना में मैं थोडा भाग्यशाली रहा हूँ क्योंकि मुझे इतना कुछ गलत नहीं करना पड़ा और अंततः अब तो ऐसे काम से पीछा भी छूट गया है..उसे जाते जाते समझाया की वो ये काम कंपनी के लिए कर रहा है,इसका फायदा उस कंपनी को होगा और उसे तो उसकी मेहनत   का ही पैसा मिलेगा (वो कमीशन पर नहीं है.),उस महिला के बारे में तुझे पता नहीं था या बड़े बड़े फिल्मस्टार्स और क्रिकेटर्स भी तो जिन कंपनियों के उत्पादों का प्रचार कर रहे हैं उनकी प्रशंशा  बढ़ा चढ़ाकर  ही तो करते हैं इसमें बेईमानी कैसी?
    लेकिन सच तो ये है की इन सभी तर्कों के खोखलेपन को वो भी मेरी तरह समझता होगा.उसे जाने के बाद लगा की एक हद तक मैं खुद भी तो ये काम कर चूका हूँ और उसकी तरह ही लम्बे समय से परेशान भी रहा हूँ. भले ही मेरे काम की प्रकृति थोड़ी अलग हो.अपनी कम्पनी के उत्पादों और सेवाओं की बढ़ा चढ़ाकर प्रशंशा,ग्राहकों से अतिशयोक्तिपूर्ण दावे जबकि मुझे पता हैं इनमे से कई तो कभी पुरे ही नहीं होंगे यहाँ तक की उनकी शिकायतों के निपटारे के बारे में भी झूठे आश्वासन.क्योंकि पता है की कम से कम निजी कंपनियों में नोकरी में रहते केवल मेहनत से तो कुछ  नहीं होने वाला जब तक की हम झूठ न बोलें.कभी कभी तो बहुत बुरा लगता है की हमसे अच्छे तो वो किसान और मजदूर है जो हाड तोड़ महनत तो  करते हैं पर हमारी तरह बेईमानी करने को तो मजबूर नहीं.जबकि हम पढ़े लिखे और सभ्य  लोग कभी मजबूरी के नाम पर तो कभी व्यवहारिकता के नाम पर झूठ बोल रहे हैं,बेईमानी कर रहे हैं.
            मैं और मेरा दोस्त तो शायद उतने मजबूर नहीं है,हो सकता है मेरा दोस्त भी नौकरी छोड़ दे  या बदल ले  या कोई छोटा मोटा  बिजनेस  करने लगें जहां शायद ये सब करने की जरुरत न पड़े बाकी भविष्य का कोई पता नहीं किसे कहाँ ले जाए.लेकिन बहुत से लोग सचमुच मजबूर होंगे,उनके मन में ये ख्याल भी आता होगा लेकिन कुछ कर नहीं सकते.जिन्हें न अच्छी जॉब मिलती है न ही वे कोई खुद  के स्तर पर कोई काम कर सकते हैं.तो क्या उपभोक्तावाद की ऐसी आंधी आ गई  है की या तो खुद को कोसते रहो या व्यावहारिकता के नाम पर सब कुछ चलते रहने दो.ये बातें मैं खूब सोच विचार के बाद लिख रहा हूँ.क्योंकि ब्लॉग्गिंग है ही इसलिए.इसका यही तो फायदा है.और यहाँ सब कुछ निजी होकर भी सार्वजनिक है लेकिन साथ ही सब कुछ सार्वजनिक होकर भी निजी है(आप समझ गए होंगे मैं ये बात क्यों कह रहा हूँ.).
चैपल की चतुराई या बेईमानी?
 ऑस्ट्रेलिया के साथ मुकाबले से पहले टीम इंडिया के खिलाफ चैपल की सेवाएँ लेने को लेकर एक अजीब सी बहस छिड़ गई है.क्योंकि चैपल  भारतीय टीम के पूर्व कोच रहने के कारण सचिन जैसे खिलाडियों की कुछ  ऐसी कमियों से भी परिचित हैं जिन्हें सिर्फ कोच से ही डिस्कस किया जाता है.और जिन्हें गुरु ग्रेग ऑस्ट्रेलिया टीम के सामने disclose  कर सकते है.बहस इसी बात पर है की क्या चैपल का ये कदम अपने एक पूर्व शिष्य यानी टीम इंडिया के खिलाफ बेईमानी कहलायेगा जैसा की एक पूर्व क्रिकेटर ने कहा की आप एक कंपनी छोड़कर दुसरी में जाते हैं तो पहली वाली के सेक्रेट्स खोलना अनैतिक है,या इसमें कोई बुराई नहीं क्योंकि अनुभव फिर किस चिड़िया का नाम हैं.इसका इस्तेमाल चैपल  कर भी रहे हैं तो इसमें गलत कहाँ हैं.हाँ यदि इंडियन टीम का कोच रहते उन्होंने जान बूझकर हमारे खिलाडियों को सिखाने में कमी रखी तो जरूर ये अनैतक है.आप क्या कहते हैं?