Sunday, April 29, 2012

अश्लीलता:खुद महिलाओं का नजरिया क्या हैं?



यह तब की बात हैं जब मल्लिका शेरावत फिल्मों में आई ही थी.उनकी एक फिल्म के सेट पर उनसे किसी पत्रकार ने पूछा कि क्या आपको नहीं लगता कि फिल्मों में टू पीस बिकनी पहनना अश्लीलता को बढावा देना हैं,इसके जवाब में मल्लिका ने कहा कि आप मुझसे क्या पूछ रहे हैं उस हीरो से जाकर क्यों नहीं पूछते उसने तो वन पीस ही पहन रखा हैं.जाहिर सी बात हैं इस जवाब के बाद उस पत्रकार के पास पूछने के लिए कुछ नहीं रह गया था.मल्लिका का ये बयान उस समय बहुत चर्चा में रहा था.तब बहुतों को लगा होगा कि मल्लिका एक बोल्ड विचारों वाली आधुनिक महिला हैं. लेकिन इसके कुछ समय के बाद उनकी एक फिल्म मर्डर की शूटिंग चल रही थी इसके लिए मल्लिका को एक टॉपलेस दृश्य देना था जिसके लिए निर्माता महेश भट्ट ने उनकी स्वीकृति पहले ही प्राप्त कर ली थी.लेकिन जिस दिन ये दृश्य शूट किया जाना था तभी ऐन वक्त पर मल्लिका ने ऐसा करने से मना कर दिया.बाद में जब उनसे इसके बारे में पूछा गया तो उनका जवाब था कि हाँ पहले मैं ऐसा दृश्य करने वाली थी लेकिन कहीं न कहीं मुझमें भी वही साधारण और पारंपरिक भारतीय लडकी बैठी हुई हैं जिसने मुझे ऐसा करने से रोक दिया.यानी कि जो महिला अंग प्रदर्शन जैसे विषय पर भी समानता को लेकर इतने बोल्ड विचार रखती हो उस पर भी समाज की ही एकतरफा सोच हावी हैं वर्ना देखा जाए तो पुरुषों द्वारा भी तो टॉपलेस दृश्य करना आम बात हैं शायद ही किसी अभिनेता को इसमें झिझक महसूस हुई हों क्योंकि संस्कारों को कायम रखने की अपेक्षा समाज ज्यादातर महिला से ही करता हैं.
                    एक बार विद्रोही लेखिका तसलीमा नसरीन ने भी अपने किसी लेख में कहा था की मैं बचपन में शुरू से ही सोचा करती थी की जिस तरह मेरा भाई घर में आजादी से रह सकता वैसा मैं क्यों नहीं कर सकती,जिस तरह वह घर में बिना बनियान के केवल निकर में घूम सकता है वैसी आजादी मुझे क्यों नहीं है.क्या सिर्फ इसलिए की मेरी शारीरिक संरचना थोड़ी अलग है?जब मैंने पहली बार ये पढ़ा तो मैं कई देर तक सोच में पड़ गया क्योंकि देखा जाए तो तसलीमा ने ऐसी कोई अनोखी  बात नहीं कही लेकिन इस तरफ हमारा ध्यान क्यों नहीं जाता?ये कितनी स्वाभाविक सी बात है हमें गर्मी लगी तो कुछ देर के लिए शर्ट उतार ली लेकिन यही काम यदी महिला भी कर ले तो कौनसा आसमान टूट पडेगा? लेकिन सच तो ये है की हमारे लिए ऐसे किसी दृश्य की कल्पना करना भी बहुत भयानक है और पुरुष ही क्या खुद महिला भी ये नहीं सोच सकती की वह अपने ही घर में ही अपने पिता या भाई के सामने गर्मी से बचने के लिए ऐसा कोई जतन करे.लेकिन महिलाओं पर ही आपत्ति क्यों?शायद इसलिए की  हमें पुरुषों को ऐसा करते देख देखकर आदत पड़ गई है या शायद इसलिए की पुरुष महिलाओं को अपनी तरह से बेफिक्र रहते देखना ही नहीं चाहते.मुझे लगता है की दोनों बातें सही हैं.यदि हम भी शुरू से ही महिलाओं को पुरुषों की तरह ही ये सब करते देखते तो हमें कुछ भी गलत नहीं लगता और न महिलाओं के छोटे कपडे पहनने या बिना ऊपर का वस्त्र पहने घर में घूमने को अनैतिक समझा जाता.
                 लेकिन ऐसा भी नहीं है की केवल भारतीय समाज में ही ऐसा दोहरा रवैया देखने को मिलता हो बल्कि खुद आधुनिक समझा जाने वाला पश्चिमी समाज भी इससे पूरी तरह तो मुक्त नहीं ही हैं.तभी वहाँ भी गो टोपलेस या slutwalk जैसे मूवमेंट्स होते रहते हैं.लेकिन इतना जरूर है की वहाँ पर हमारी तुलना में उनके पास महिलाओं के कपड़ों के अलावा चिंता करने के लिए और भी विषय हैं.वहाँ पर महिलाओं से छेड़छाड़ और उनकी तरफ घूरना आदी कम होता हैं और महिलाएं भी शायद उतना असहज महसूस नहीं करती जितना हमारे यहाँ.और न ही महिलाओं के साथ होने वाले दुर्व्यवहार के लिए उनके कपड़ों को उतना जिम्मेदार ठहराया जाता है जितना हमारे यहाँ.शायद इसका कारण ये है की वहाँ पुरुष महिलाओं को पहले से ही छोटे कपड़ों में घुमते स्विमिंग पूल किनारे धुप सेंकते देखते रहे हैं इसलिए उनके लिए यह कोई कौतूहूल का विषय नहीं है,बल्कि भारत में भी कई आदिवासी जातियों में महिलायें नाम मात्र के ही वस्त्र पहनती हैं.वहाँ पुरुषों को स्त्री शरीर के उभारों और कटावों को लेकर कोई उत्सुकता नहीं हैं यहाँ तक की स्तनों को भी बच्चे को दूध पिलाने के काम आने वाले अंग से ज्यादा महत्त्व नहीं दिया जाता.वहाँ छेड़छाड़ या बलात्कार जैसे अपराधों के बारे में भी कभी नहीं सुना जाता.यानी कपडे कोई कारण नहीं है जबकि मुख्यधारा के समाज में कपड़ों को लेकर ही सबसे ज्यादा हाय तौबा मचाई जाती हैं.
                              सवाल यही है की महिलाओं के कपडे ही हमारे लिए इतने महत्तवपूर्ण क्यों हैं की उनके आधार पर ही उनको चरित्र प्रमाण पत्र दिया जाता है जबकि पुरुषों के लिए ऐसा कोई मापदंड कभी नहीं रहा?एक बात और नहीं समझ आती की केवल महिलाओं के सन्दर्भ में ही स्त्री अशिष्ट रुपण अधिनियम जैसा कानून क्यों बना हुआ हैं?क्या हम मानकर चल रहे हैं की गरीमा सिर्फ महिलाओं की ही होती है जिसे बचाए जाने की बहुत जरूरत हैं?तो फिर यदी पुरुष भी केवल महिलाओं के ही अंग प्रदर्शन पर ही उंगली उठाते हैं तो इसमें आश्चर्य कैसा,कैसी आपत्ति? क्योंकि वो तो पहले से ही केवल महिलाओं पर ही मर्यादा,इज्जत आदी भारी भरकम शब्द लादकर मनमानी करते आये हैं.मेरा उद्देश्य किसी कानून या मान्यता को गलत ठहराने का नहीं है लेकिन मैं जानना चाहता हूँ की ऐसा क्यों हैं.
                अभी हाल ही में एक अदालत ने फिल्म हेट स्टोरी के पोस्टरों को अश्लील  बताकर बैन करवा दिया था.यहाँ ब्लॉग पर भी एक पोस्ट में इसी फिल्म के एक पोस्टर पर कईयों ने आपत्ति की थी की यह पोस्टर अश्लील हैं.इस पोस्टर में नायिका की पीठ को पूर्णतः निर्वस्त्र दिखाया गया था.मैं मानता हूँ की इस पोस्ट में ऐसी तस्वीर की कोई जरूरत नहीं थी वैसे भी यहाँ नेट पर बहत से बच्चे भी आते हैं अतः ऐसा करने से बचना चाहिए क्योंकि हर चीज के लिए एक सही उम्र होती हैं.लेकिन मैं इस बात पर दुविधा में हूँ की इस तस्वीर को अश्लील माना जाए या नहीं.क्योंकि बहुत से पुरुष कलाकारों की भी तो ऐसी तस्वीरें छपती रहती हैं जिसमें पीठ क्या सीना भी नग्न दिखाया जाता हैं.यदी सलमान की कोई बिना शर्ट वाली तस्वीर वहाँ पोस्ट में डाल दी जाती तो क्या हमें वह भी अश्लील लगती?ये बात ठीक है की कई ब्लॉगर दूसरों का ध्यान खींचने के लिए भी इस तरह की तस्वीरें पोस्ट में डाल देते हैं उनका विरोध होना चाहिए लेकिन ये कैसे  तय किया जाएगा  की कौनसी तस्वीर या द्रश्य अश्लील हैं और कौनसा नहीं?हाँ पब्लिसिटी  के लिए कोई ऐसा करता है तो उसका विरोध होना चाहिये.
                     इसी तरह 'इण्डिया टुडे' के नवीनतम अंक में कवर स्टोरी पर भी बवाल मचा हुआ हैं जिसके मुख प्रष्ठ पर एक तस्वीर छापी हैं जिसमें एक महिला अपने हाथों से अपने अनावृत वक्ष को छुपाये हुए हैं.कवर स्टोरी भारतीय महिलाओं में सौन्दर्य की चाह में ब्रेस्ट सर्जरी के बढ़ते चलन को लेकर हैं.और शीर्षक 'उभार की सनक' जैसा कुछ दिया गया हैं.कई लोगों को आवरण प्रष्ठ पर दिए गए चित्र पर आपत्ति है परन्तु मुझे तो इसमें कुछ ख़ास बात बात नही लगी.यदी शीर्षक ही ऐसा है तो चित्र किसी गुलदस्ते या इन्द्रधनुष का तो होने से रहा.पर एक बार मान लीजिये की आवरण कथा लड़कों में डोल्ले शोले बनाने ले लिए जिम जाने के बढ़ती प्रवृति को लेकर होती और कवर पृष्ठ पर जोन अब्राहिम की मांसपेशियां दिखाती कोई तस्वीर होती तो क्या उस पर भी हंगामा मचता ? जोन को तो तब अपना सीना छुपाने की भी जरुरत नहीं पड़ती.
                पुरुष यदी महिलाओं के चित्रों आदी पर आपत्ति करता हैं तो माना जा सकता है की वह खुद अपने को बंधन मुक्त रख  महिलाओं को संस्कारों के नाम पर बांधें रखना चाहता हैं.ताकि महिलाओं को खुद अपने बारे में सोचने की ही फुर्सत न मिलें.लेकिन खुद महिलायें और खासकर वो महिलायें जो समानता जैसे मूल्यों में विश्वास रखती हैं और पित्रसत्ता  की बारीक बुनावट को भी समझती हैं वो इस बारे में क्या सोचती हैं?क्या उन्हें भी सलमान,जोन या शाहिद की बजाय केवल  महिलाओं की ही ऐसी तस्वीरें अश्लील लगती हैं?कहीं ऐसा तो नहीं की ये महिलायें भी किसी दूसरी महिला को कम कपडे या बिकिनी जैसे परिधानों में देखकर ये तो नहीं सोचती की ये महिलायें उनकी(स्त्रियों की) गरीमा को कम कर रही हैं?इसके लिए मुझे तमाम महिलायें माफ़ करें लेकिन कभी कभी मुझे लगता है की महिलाओं को भी अपनी उस पारंपरिक और लगभग पवित्र छवि से मोह हो गया है जो उनके लिए कभी पुरुषों ने गढ़ी थी जबकि वो खुद ही ये भी कहती हैं की कपडे कोई मापदंड नहीं होना चाहिए.पुरुषों का बचना तो मुश्किल हैं ही लेकिन सच तो ये हैं की खुद महिलायें भी इन सवालों से बच नहीं सकती बल्कि ये सवाल उनके सर पर भी भूत बनकर नाचते रहेंगे.नहीं.... मैं किसी की सोच को गलत नहीं बता रहा हूँ और न ही मुझे इसका कोई हक़ है लेकिन जानना चाहता हूँ की इसके पीछे कारण क्या हैं और मेरा सोच गलत हैं तो आप कृपया मुझे सही करें वैसे भी यहाँ किसीकी सोच या निर्णय अंतिम कहाँ होता हैं.
                    महिलायें कह सकती हैं की अंग प्रदर्शन करने वाली महिलाओं की बजाय वे पुरुषों की भोगी व वासनात्मक प्रवर्ति का विरोध करती हैं.यदि ऐसा हैं तो ये बात अच्छे अन्न की भांति सराहनीय हैं.ऐसा होना चाहिए और शायद हो भी रहा है लेकिन एक बार सवाल फिर से दोहरा दूं की इसके लिए उन चित्रों को अश्लील क्यों कहा जाए?यहाँ तो दोष पुरुष की दृष्टी का हैं लेकिन क्या चित्र को अश्लील बताकर या खुद महिला पर ही उंगली उठाकर हम उन्हीं पुरुषों का ही तो पक्ष मजबूत नहीं कर रहे जो समाज में महिला के प्रति बढ़ते छेड़छाड़ या बलात्कार जैसे अपराधों के लिए महिलाओं द्वारा अंग प्रदर्शन को ही जिम्मेदार ठहराते हैं.
                        और जहां तक बात हैं पुरुषों द्वारा आपत्ति का सवाल है की कोई मल्लिका या पूनम पाण्डेय स्त्री की गरीमा को कम कर रही हैं या इनकी वजह से महिलाओं का सम्मान कम हो जायेगा तो उन्हें भी ये सोचना चाहिए की ग्लेमर जगत में इमरान हाशमी से लेकर सलमान या मिका तक सभी ये ही तो कर रहे हैं तो क्या इनकी वजह से महिलाओं ने हमारा सम्मान करना बंद कर दिया फिर कुछ महिलाएं भी यही सब कर रही हैं तो इससे हमें क्यों फर्क पड़ना चाहिए और हम उन्हें महत्त्वा ही क्यों दें?
                और वैसे भी जहाँ महिलायें घूंघट या बुर्के में रहती हैं वहाँ क्या उनका बहुत सम्मान किया जाता हैं और क्या उन्हें वहाँ बराबरी के सारे अधिकार हासिल हैं?ये सब भी तो महिलाएं करके देख चुकी हैं लेकिन सच तो ये है की सम्मान तब होगा जब पुरुष मन से ऐसा चाहेंगे वरना महिलायें कुछ भी कर लें पुरुषों की सोच महिलाओं को लेकर नहीं बदलने वाली.फिलहाल तो सबसे ज्यादा जरूरी यही है की कोई कैसे कपडे पहने या कैसे नहीं और कितना शरीर दिखाए या कितना नहीं इसमें किसी दुसरे का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए.शरीर जिसका है वही इसके बारे में तय करें.समय के साथ कई चीजों को लेकर सोच बदलती रहती हैं जैसे कुछ साल पहले तक किसी महिला के स्लीवलेस कुर्ता या जींस आदी पहनने पर ही दूसरों की नजरें टेढ़ी हो जाती थी खुद महिला भी भीड़ में असहज महसूस करती थी पर अब ऐसा कम ही होता है या होता ही नहीं हैं.पता नहीं कितना सही हैं लेकिन कई जगह पढ़ा है की अंग्रेजों के आने से कुछ समय पहले तक भारत में कई जगहों पर स्त्री और पुरुष ऊपर का वस्त्र पहनते ही नहीं थे.यदि ऐसा है तो आज ये हालत कैसे हो गई की महिलाओं के कपडे ही हमारे लिए उनके चरित्र का पैमाना बन गए?
जेम्स  बोंड महिला विरोधी हैं?
कई लोगों का मानना है की जेम्स बोंड का किरदार महिला विरोधी  हैं.यहाँ तक की होलीवुड  की कई नायिकाएं भी इसी कारण जेम्स बोंड की फिल्मों में काम करने से मना कर चुकी है.क्योंकि उनका मानना है की जेम्स बोंड को महिलाओं के जज्बातों की क़द्र नहीं हैं वह अपने काम निकलने के लिए उन्हें मोहरा बनता हैं और फिर उनसे किनारा कर लेता हैं यहाँ तक की वह अलग अलग देशों में जाता है और अपने अहम् की संतुष्टी के लिए कई महिलाओं के साथ बेड साझा करता हैं.लेकिन मुझे ये नहीं समझ आता की हम शारीरिक संबंधों जिनमे महिला और पुरुष की बराबर की भागीदारी  होती हैं वहाँ भी हमेशा पुरुष को शिकारी और महिला को शिकार के रूप में ही क्यों देखते हैं?यही काम तो लारा क्राफ्ट या चार्लीज़ एंजेल्स जैसी फिल्मों में नायिकाएं भी तो करती हैं लेकिन पुरुषों को तो ये शिकायत नहीं होती की उनका इस्तेमाल हो रहा है.कुछ लोग यहाँ छुरी या खरबूजे वाली मिसाल दे सकते हैं लेकिन मैं यही जानना चाहता हूँ की स्त्री को हम खरबूजा ही क्यों मान रहे हैं.इसके अलावा जेम्स बोंड की बोस ही एक महिला है जिसका नाम ऍम हैं और उसके आदेश के बिना जेम्स बोंड कुछ नहीं कर सकता और उसे लगभग हर फिल्म में अपनी ही नायिकाओं से पिटाई खाते हुए भी दिखाया जाता है फिर भी उसे महिला विरोधी  क्यों कहा जाए या हमारी आदत ही हो गई है स्त्री को हर बार इतना कमजोर मानने की जैसे कोई भी पुरुष उसका इस्तेमाल कर सकता है?