Tuesday, December 20, 2011

नैतिकता:एक प्रशन यहाँ भी ...


आजकल ब्लॉगजगत में नैतिकता और अनैतिकता को लेकर बहस का सीजन चल रहा है.सोचा कई दिनों से मन में कुलबुला रहे प्रश्नों को आपके सामने रखने का येही सही समय हो.वैसे भी आजकल समय कम ही मिल पता है,यहाँ तक की रविवार को भी आजकल तो आधा समय काम ही करना पड़ता है और कुछ सप्ताह और ऐसा ही चलेगा.लेकिन आज एक बहाना बनाकर छुट्टी ले ही ली.या यूँ कह लें की छोटे से कारण को एक बड़ा कारण बता दिया  (अनैतिकता) .क्या करें आराम ही नहीं मिल पाता.तबीयत इतनी भी खराब नहीं की काम ही न कर सकूँ.खैर ये आदत तो मैं आने वाले समय में सुधार ही लूँगा.  लेकिन यहाँ मेरा सवाल दूसरा है.
                   वैसे तो मैं शुरू से ही मानता रहा हूँ की व्यापार की तुलना में नौकरी करना न सिर्फ कठिन है बल्कि कई बार इसमें आपको अपने आताम्सम्मान को भी गिरवी रखना पड़ता है चाहे नौकरी सरकारी हो या प्राइवेट और चाहे  आप कितने ही बड़े पद पर क्यों न हो. खासकर तब जब आप पर हुकुम चलने वाला या आपको डांटने वाला आपकी तुलना में एक बुरा व्यक्ति हो जबकि  आपको कभी भी खुद आपके मां बाप ने उस तरह से ना डांटा हो.हालांकि समय के साथ ये बात तो समझ में आ गई की नौकरी में हमेशा ऐसा ही हो ये जरुरी नहीं.और जो आपको डांट रहा है वो जरुरी नहीं निजी दुश्मनी निकल रहा हो.उसे भी अपने से बड़े अधिकारीयों की दो बातें तो सुननी पड़ती है.वैसे भी लोग किसी भी तरह की नौकरी करना ही बंद कर दें तो सारी व्यवस्था ही बिगड़ जाए. एक समय ऐसा भी था जब ये माहौल था की यदि आपको कोई अच्छी सरकारी नौकरी चाहिए तो इसके लिए चेक और जैक दोनों का जुगाड़ होना ही चाहिए.हालांकि तभी मैंने ये बात भी सोच ली थी की चाहे जो हो जाए लेकीन मेर पास ऐसा कोई अवसर खुद चलकर भी आया तो भी मैं स्वीकार नहीं करूँगा चाहे जिन्दगी भर धक्के ही क्यों न खाने पड़े.हालांकि हालत इतनी खराब नहीं थी लेकिन हाँ ,बहुत अच्छी भी नहीं कह सकते की कुछ करने की जरुरत ही ना पड़े.
पर सवाल यहीं ख़तम हो गए हों ऐसा  नहीं है.कुछ दिनों पहले अपने एक पुराने दोस्त से लम्बे समय बाद मुलाकात हुई जो की एक निजी इंश्योरंस कंपनी में काम करता है.उसने शुरुआती बातचीत के बाद बताया की कई बार अपनी मोटी सेलेरी  के बावजूद उसे अपनी जॉब छोड़ देने का मन होता है.कारण सुनकर मैं खुद हैरान था क्योंकि स्कूल और कॉलेज के समय से  ही हमेशा बेफिक्र और मस्ती के मूड में रहने वाले अपने दोस्त को मैंने इससे पहले कभी इतनी गंभीर  बातें करते नहीं देखा.उसने बताया की कैसे उसे अपनी परफोर्मेंस  अच्छी रखने के लिए रोज सैकड़ों झूठ अपने clients  से बोलने पड़ते है.इन्स्योरंस  के बेनिफिट्स को बढ़ा चढ़ाकर बताना पड़ता है,कुछ जानकारियों और शर्तों को घुमा फिराकर बताना पड़ता है.यहाँ तक की कई बार तो सविंग्स पर ब्याज भी गलत केलकुलेट करके बताना पड़ता है.ग्राहक चाहे जितना पढ़ा लिखा हो पर इतनी बारीकियों को वह नहीं समझता.जब मैंने पुछा की आज तीन साल बाद उसे अचानक इस बात पर दुःख क्यों हुआ.तब उसने बताया की खुश तो वो अपने काम से पहले भी नहीं था लेकिन कुछ समय पहले जब उसने एक पालिसी करवाई और उसे पता चला की वह पालिसी udaipur  की किसी विधवा महिला के बच्चे के नाम से थी जिसके पास अपने दिवंगत फ़ौजी पति की पेंशन  के अलावा और कोई आय का साधन नहीं था.telephone  पर उस महिला को बीमा ऑफर करते हुए उसे ये बात  पता नहीं चल पाई क्योंकि उसने उससे बिना कोई ज्यादा जानकारी लिए ही उसे कन्विंस  कर लिया था लेकिन उसका फॉर्म भरते समय जब पता चला तो लगा जैसे सर पर घड़ों पानी पड़ गया हो.वो इसी बात पर परेशान था की न जाने उसने ऐसे ही और कितने ही लोगों को झूठे वायदे किये होंगे.
                 उसकी सारी बातें सुनकर मैं खुद भीतर से परेशान था.और उसे लघभग उन्ही सारे तर्कों(या बहाने कह लीजिये) से दिलासा दिया जिनसे मैं अपने मन को बहलाता रहा हूँ अलग अलग कंपनियों में कुछ सालों की अपनी नोकरियों के दौरान. हालांकि उसकी तुलना में मैं थोडा भाग्यशाली रहा हूँ क्योंकि मुझे इतना कुछ गलत नहीं करना पड़ा और अंततः अब तो ऐसे काम से पीछा भी छूट गया है..उसे जाते जाते समझाया की वो ये काम कंपनी के लिए कर रहा है,इसका फायदा उस कंपनी को होगा और उसे तो उसकी मेहनत   का ही पैसा मिलेगा (वो कमीशन पर नहीं है.),उस महिला के बारे में तुझे पता नहीं था या बड़े बड़े फिल्मस्टार्स और क्रिकेटर्स भी तो जिन कंपनियों के उत्पादों का प्रचार कर रहे हैं उनकी प्रशंशा  बढ़ा चढ़ाकर  ही तो करते हैं इसमें बेईमानी कैसी?
    लेकिन सच तो ये है की इन सभी तर्कों के खोखलेपन को वो भी मेरी तरह समझता होगा.उसे जाने के बाद लगा की एक हद तक मैं खुद भी तो ये काम कर चूका हूँ और उसकी तरह ही लम्बे समय से परेशान भी रहा हूँ. भले ही मेरे काम की प्रकृति थोड़ी अलग हो.अपनी कम्पनी के उत्पादों और सेवाओं की बढ़ा चढ़ाकर प्रशंशा,ग्राहकों से अतिशयोक्तिपूर्ण दावे जबकि मुझे पता हैं इनमे से कई तो कभी पुरे ही नहीं होंगे यहाँ तक की उनकी शिकायतों के निपटारे के बारे में भी झूठे आश्वासन.क्योंकि पता है की कम से कम निजी कंपनियों में नोकरी में रहते केवल मेहनत से तो कुछ  नहीं होने वाला जब तक की हम झूठ न बोलें.कभी कभी तो बहुत बुरा लगता है की हमसे अच्छे तो वो किसान और मजदूर है जो हाड तोड़ महनत तो  करते हैं पर हमारी तरह बेईमानी करने को तो मजबूर नहीं.जबकि हम पढ़े लिखे और सभ्य  लोग कभी मजबूरी के नाम पर तो कभी व्यवहारिकता के नाम पर झूठ बोल रहे हैं,बेईमानी कर रहे हैं.
            मैं और मेरा दोस्त तो शायद उतने मजबूर नहीं है,हो सकता है मेरा दोस्त भी नौकरी छोड़ दे  या बदल ले  या कोई छोटा मोटा  बिजनेस  करने लगें जहां शायद ये सब करने की जरुरत न पड़े बाकी भविष्य का कोई पता नहीं किसे कहाँ ले जाए.लेकिन बहुत से लोग सचमुच मजबूर होंगे,उनके मन में ये ख्याल भी आता होगा लेकिन कुछ कर नहीं सकते.जिन्हें न अच्छी जॉब मिलती है न ही वे कोई खुद  के स्तर पर कोई काम कर सकते हैं.तो क्या उपभोक्तावाद की ऐसी आंधी आ गई  है की या तो खुद को कोसते रहो या व्यावहारिकता के नाम पर सब कुछ चलते रहने दो.ये बातें मैं खूब सोच विचार के बाद लिख रहा हूँ.क्योंकि ब्लॉग्गिंग है ही इसलिए.इसका यही तो फायदा है.और यहाँ सब कुछ निजी होकर भी सार्वजनिक है लेकिन साथ ही सब कुछ सार्वजनिक होकर भी निजी है(आप समझ गए होंगे मैं ये बात क्यों कह रहा हूँ.).
चैपल की चतुराई या बेईमानी?
 ऑस्ट्रेलिया के साथ मुकाबले से पहले टीम इंडिया के खिलाफ चैपल की सेवाएँ लेने को लेकर एक अजीब सी बहस छिड़ गई है.क्योंकि चैपल  भारतीय टीम के पूर्व कोच रहने के कारण सचिन जैसे खिलाडियों की कुछ  ऐसी कमियों से भी परिचित हैं जिन्हें सिर्फ कोच से ही डिस्कस किया जाता है.और जिन्हें गुरु ग्रेग ऑस्ट्रेलिया टीम के सामने disclose  कर सकते है.बहस इसी बात पर है की क्या चैपल का ये कदम अपने एक पूर्व शिष्य यानी टीम इंडिया के खिलाफ बेईमानी कहलायेगा जैसा की एक पूर्व क्रिकेटर ने कहा की आप एक कंपनी छोड़कर दुसरी में जाते हैं तो पहली वाली के सेक्रेट्स खोलना अनैतिक है,या इसमें कोई बुराई नहीं क्योंकि अनुभव फिर किस चिड़िया का नाम हैं.इसका इस्तेमाल चैपल  कर भी रहे हैं तो इसमें गलत कहाँ हैं.हाँ यदि इंडियन टीम का कोच रहते उन्होंने जान बूझकर हमारे खिलाडियों को सिखाने में कमी रखी तो जरूर ये अनैतक है.आप क्या कहते हैं?                                                                                                                                                                                                        

Sunday, October 16, 2011

अंतरजाल पर हावी भीडतंत्र


                                 हाल ही में कश्मीर पर प्रशांत भूषण द्वारा लापरवाही भरे बयान के बाद हुए कायराना हमले और इससे पहले दिग्विजय सिँह द्वारा 22 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने के बाद इंटरनेट के सकारात्मक और नकारात्म प्रभावों को लेकर बहस फिर तेज हुई है.क्योंकि दोनों ही मामले कहीं न कहीं इंटरनेट के दुरुपयोग से जुडे हुए है.
वैसे तो मिस्त्र ट्यूनिशिया और इंग्लैण्ड के विरोध प्रदर्शनों के बाद से ही दुनियाभर में अंतरजाल पर सोशल साईटों के बढते प्रभाव को लेकर चर्चा हो रही है.हालाँकि भारत में इंटरनेट यूजर्स की संख्या अपेक्षाकृत कम है लेकिन ऐसा भी नहीं है कि हमारे यहाँ अभी तक सब ठीक ठाक ही चलता रहा हो.धर्म के नाम पर एकतरफा और नफरत फैलाने वाले ब्लॉग,ढेरों पोर्न साईटें और ब्लॉग्स यहाँ तक कि खलिस्तान और माओवाद समर्थक प्रोपेगेंडा साईटें पहले से चल रही थी.लेकिन फेसबुक और ऑरकुट के जरिये कभी कभी कश्मीर के लडकों को सुनियोजित तरीके से भडकाकर पत्थरबाजी कराने के अलावा इसका कोई खास गलत असर अभी तक देखने में नहीं आया लेकिन हाँ...ये भविष्य के लिए एक संकेत तो है ही.
लेकिन जैसे जैसे इंटरनेट प्रयोग करने वालों की तादाद बढती जा रही है,सरकार की भी परेशानी बढती जा रही है क्योंकि इससे इन चीजों को और बढावा मिलेगा.इस तरह के स्टंटबाज केवल सरकार को ही नहीं आम आदमी को भी मुसीबत में डाल सकते है खासकर जब धर्म और राष्ट्र के नाम पर भीडतंत्र वाली बातें की जा रही हों.यहाँ तक तो सरकार की भी चिंता जायज है.जब भीड के अनियंत्रित होने और शांतिभंग की आशंका होती है तो वास्तविक जगत में धारा 144 जैसे ऊपाय किये जाते है तो फिर कोई न कोई तरीका साईबर स्पेस में भी आजमाया जाए क्योंकि मामला यहाँ भी उतना ही संवेदनशील है और यहाँ लोग कहीं ज्यादा आसानी से इकठ्ठा हो सकते है और एकतरफा व भडकाऊ प्रलाप कर सकते हैं.पोर्न साईटों या साइबर ठगी के इक्का दुक्का मामलों में पहले भी कार्रवाही होती रही है.पर इस दिशा में सरकार अभी तक सख्त नहीं हुई है हालाँकि 2008 में ही आईटी नियमों में मनचाहे संशोधन कर सरकार इंटरनेट उपयोगकर्ताओं पर लगाम कसने की तैयारी कर चुकी है.यहाँ तक कि 11 साईटों को बिना कारण बताएँ बंद भी किया जा चुका है.हो सकता है आगे और सख्ती करनी पडे.
मगर क्या वास्तव में सरकार की परेशानी का कारण उपरोक्त ही है?ऐसा लगता तो नहीं.दरअसल पारंपरिक मीडिया के सरकार और पूँजीपतियों के हाथ का खिलौना बन जाने के बाद इन्टरनेट एक वैकल्पिक मीडिया के रूप में सामने आया है जो बहुत हद तक दबाव से मुक्त है.यही कारण है की जिन मुद्दों से मुख्यधारा का मीडिया बचता रहा है या जिन पर उसका रवैया तटस्थ रहा है पिछले दिनों उन्हें ब्लॉग और सोशल साइटों पर लगातार उठाया जाता रहा है.महंगाई या भरष्टाचार के मुद्दे हों या पूर्वोत्तर या कश्मीर के सवाल हो,आम आदमी को अपनी आवाज उठाने को  इन्टरनेट के जरिये एक अच्छा मंच मिल गया है.एस.गुरुमूर्ति और डॉ. सुब्रह्मनियम स्वामी के खुलासों को पहले इसी माध्यम के द्वारा जनता के सामने लाया गया यहाँ तक की टूजी घोटाले से जुड़े कई तथ्य भी पहले नेट पर प्रसारित किये जाते रहे उसके बाद मीडिया ने उन्हें जगह दी.टीम अन्ना का आन्दोलन तो साइबर वर्ल्ड से ही परवान चढ़ा.इसके अलावा भूमि अधिग्रहण नीति,आदिवासियों के प्रति सरकारी रवैया और विनायक सेन प्रकरण पर तो हाल ही में लिखा गया.और भी कई मुद्दे बीच बीच में उठते रहे हैं जिन पर निष्पक्ष बहस की उम्मीद मुख्यधारा के सरकारी और गैर सरकारी मीडिया से नहीं की जा सकती.अतः ये कहना सही नहीं होगा की केवल प्रोपेगेंडा करने वालों से ही सरकार को परेशानी है.
                                    वैसे भी सरकार अपने खिलाफ लोगों को जागरूक करने वालों को परेशान करती रही है.आज कांग्रेस टीम अन्ना को भी उसी तरह परेशान कर रही है जैसे कभी तहलका वालों को बी.जे.पी. ने  किया था.दिग्विजय सिंह द्वारा २२ लोगों के खिलाफ शिकायत को भी इसी श्रेणी में रखा जा सकता है क्योंकि उनके बयान खुद लोगों को उकसाते है.कुछ समय पहले शिवसेना ने भी बेंगलुरू के अजित डी. नामक युवक पर केस कर दिया था.उस पर आरोप लगाया गया की उसने शिवसेना के खिलाफ लोगों को भड़काया और एक कम्युनिटी बना कई लोगों को पार्टी के खिलाफ टिप्पणी करने के लिए उकसाया.नितीश सर्कार ने तो अपने ही दो कर्मचारियों को इसलिए निलंबित कर दिया की उन्होंने फेसबुक पर सरकारी भ्रष्टाचार खिलाफ कुछ लिख दिया था.इन सब उदाहरणों से तो लगता है की सरकार अपने खिलाफ उठने वाली आवाजों को दबाना चाहती है न की उन लोगों को जो वास्तव में इन्टरनेट का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं.
                                        वैसे मेरा तो मानना है की अभी इन्टरनेट पर किसी भी वजह से किसी भी तरह की सेंसरशिप थोपने की जरुरत नहीं है क्योंकि प्रोपगेंडा करने वाले या भड़काऊ लेख लिखने वाले अभी अलग थलग पड़े हुए हैं और ज्यादातर लोग अभी ख़बरों की भूख मिटाने या दोस्तों से बतियाने या फिर दुसरे हलके फुल्के विषयों पर ही लिखने के लिए इस माध्यम से जुड़े हुए हैं.लेकिन हमें खुद इस तरह के प्रयास करने होंगे की हम सरकार को और अधिक सख्त होने का बहाना नहीं दें.इसके लिए हम खुद अपने स्तर पर क्या कर सकते है ये ज्यादा महत्तवपूर्ण है.सबसे पहले तो हम ऐसे  ब्लोगों और साइटों से खुद ही दूरी बनाकर रखें.अपनी किसी पोस्ट या टिप्पणी में इनका लिंक न दें.और न प्रोपगेंडा करने वालों के फोलोवेर बन इन्हें और उत्साहित करें.बल्कि हो सके तो दूसरों को मतलब हमारे दोस्तों या परिवार में से कोई ऐसा करे तो उन्हें भी ऐसा करने से रोकें यदी आपसे छोटे है तो ये ज्यादा जरुरी है.
                                         प्रोपगेंडा करने वालों या धर्म,किसी व्यक्ति या संगठन के बारे में दुर्भावनापूर्ण या एकतरफा लेख(आलोचनात्मक नहीं ) लिखने वालों की मानसिकता बिलकुल अलग होती है.इन्हें लगता है मानो ये कोई बहुत बड़ा वैचारिक और सार्थक आन्दोलन चला रहे है.p.b. पर हमला करने वालों ने पहले इन्टरनेट पर ही भरपूर समर्थन जुटा लिया था.इन्हें केवल इनके समर्थन में इनके ब्लॉग पर गए लोग ही दिखाई देते हैं और यदी इनकी संख्या धीरे धीरे बढ़ती रहती है तो इन्हें लगता है मानो सारा देश ही इनका समर्थन कर रहा है.हममें से ही कुछ ने वहाँ  इनका समर्थन कर यहाँ तक की फोलोवर बन इनका उत्साह बढाया है.इससे हमें बचना चाहिए.ऐसे लोग आगे भी साइबर जगत में रहेंगे लेकिन हमारी कोशिश होनी चाहिए की हम खुद आग में घी डालने का काम न करें.और कुछ न हो तो कम से कम इतना तो कर सकते है न की अपने ब्लॉग पर आने वाली आपत्तिजनक और दुर्भावनापूर्ण टिप्पणियों को हटा दें कई लोग ज्यादा ही लोकतान्त्रिक होने के चक्कर में इन्हें भी सजाकर रखते हैं.और यदी हम इतना भी नहीं कर सकते तो सरकारी सेंसरशिप झेलने को तैयार रहें.
जूनियर अडवानी की राजनीति में एंट्री ?
यूँ तो टी.वी. स्टार प्रतिभा अडवानी अपने पिता लालकृष्ण आडवानी के साथ पहले भी रथयात्रा में शामिल रह चुकी है लेकिन इस बार जिस जोशो खरोश के साथ उन्हें आगे किया जा रहा है उसे देखकर ये अटकलें लगाईं जा रही है की आडवानी जी अब अपनी ढलती उम्र को ध्यान में रख अपनी लाडली का राजनीतिक करिअर बनाने की तैयारी कर रहे है.आडवानी पी.एम्. बने या न बने पर शायद उन्हें लगता है की जूनियर अडवानी की लांचिंग का ये सही समय है.रथयात्रा के लिए प्रतिभा अडवानी का तैयार किया हुआ थीम सोंग लोगों को खूब पसंद आ रहा है.जिस तरह वे इस बार जनता के बीच जाकर मिल रही है उससे बाकी के कार्यकर्ताओं ने अटकलें लगानी शुरू कर दी है.वैसे आपको क्या लगता है ?

Friday, August 19, 2011

...क्योंकि फिर नहीं मिलेगा मौका

भ्रष्टाचार के खिलाफ माहौल बनता दिख रहा है. देशभर में बहुत से लोग सडकों पर है तो बहुत से 
सोशल साइटों पर डँटे हुए है.परंतु यह संख्या बहुत कम नहीं तो बहुत ज्यादा भी नहीं है.ब्रेकिंग न्यूज की होड में ही सही प्राईवेट न्यूज चैनलों ने जनलोकपाल की मुहिम को सफल बनाने में कोई कसर नहीं छोड रखी.परतु अभी अभी क्रिकेट मैच फिर से शुरु हो चुके हैं .लोगों का रुझान इस तरफ भी निश्चित रूप से होगा.वहीं न्यूज चैनल भी अपने क्रीकेट प्रेमी दर्शकों को निराश नहीं करेंगे.इस और अगले शुक्रवार को नई फिल्में भी आ सकती है.इसके अलावा बहुत से लोग तो केवल दूरदर्शन पर ही निर्भर है जिसने तीन दिन से विरोध प्रदर्शन की संभवतः एक भी तस्वीर नहीं दिखाई है.ऐसे में एक बडा वर्ग हमारे आस पास है जिसका ध्यान इस ओर से हट सकता है.और भी कई लोग है जो इसे एक सामान्य आंदोलन ही मान रहे है क्योंकि उन्हें अभी भी जनलोकपाल बिल के बारे में सामान्य बातें भी नहीं पता.ऐसे में हम लोगों की जिम्मेदारी बढ जाती है जो इस बारे में पर्याप्त जानकारी रखते है.
मैंने खुद अपने छोटे भाई और कुछ दोस्तों को जो इस बारे में रुचि नहीं ले रहे थे इसके बारे में बुनियादी बाते खासकर सरकारी बिल की कमियों जैसे शिकायत निराधार पाए जाने पर शिकायतकर्ता को ही दो साल की सजा और शिकायत सही पाए जाने पर दोषी को केवल छह सात माह की सजा आदि के बारे में बताया है.केवल इतनी बातें ही काम कर गई और उन्हें समझ में आ गया कि ये अवसर क्यों महत्तवपूर्ण है.यहाँ ब्लॉग जगत में बहुत से लोग खासकर महिलाएँ इस आंदोलन का समर्थन अपने तरीके से कर रही है.मैंने भी उनके ब्लॉग के साथ साथ कुछ मीडिया साईटों पर भी कमेंट किये है.लेकिन अब लगता है केवल इतने से काम नहीं चलेगा.क्योंकि अब लगने लगा है कि यदि ये अवसर निकल गया तो हमेशा मन में ये बात कचोटेगी कि देश के लिए एक मौका आया और मैं सक्रीय रुप से कुछ नहीं कर पाया.हालाँकि हम प्राइवेट जॉब करने वालों के लिए समय निकालाने थोडा मुश्किल होता है लेकिन अब किसी भी तरह अपना छोटा सा योगदान देना ही होगा.
अब कल से हमारे शहर में भी जगह जगह छात्रों व्यापारियों और आम लोगों की रैलियाँ निकलनी शुरु हो गई है.अतः अब मेरी पूरी कोशिश होगी लाज शर्म का घूँघट उतारकर ऐसी ही किसी रैली सभा संगत में शामिल होने की.दोस्तों और भाई को साथ लेने से हिचकिचाहट थोड़ी कम होगी(जो हम माध्यम वर्ग के लोगों कि ख़ास समस्या है)और काम आसन हो जायेगा.
           अतः आप भी कोशिश कीजिये लोगों को ये बताने की कि क्यों ये अवसर इतना महत्तवपूर्ण है.नई फिल्में,क्रिकेट,सास बहु कि चुगली सब कुछ दिनों के लिए बंद कीजिये या कम कीजिये और हो सके तो विरोध प्रदर्शनों में शामिल होइए या फिर अपने आस पास के लोगों को जन लोकपाल के बारे में जानकारी दीजिये.क्योंकि ये माहौल सिर्फ १५-२० दिन नहीं बल्कि लम्बे समय तक बनाएं  रखना हमारी ही जिम्मेदारी है.जितना हो सके जैसे हो सके हम अपना योगदान दे सके तो अच्छा होगा.
           अंत में एक बात और इस बिल के सभी प्रावधान लागू हो जाने के बाद लोकपाल विधायिका,न्यायपालिका  या कार्यपालिका के किसी काम में कोई दखल नहीं देगा.लोकपाल और लोकायुक्त केवल इनसे सम्बंधित  भरष्टाचार के मामलों कि सुनवाई और जांच करेगा इसलिए ये कहना बिलकुल गलत है कि इसके आ जाने के बाद संविधान कि मूल आत्मा ही ख़त्म हो जाएगी.हमारे चुने हुए प्रतिनिधि घोटाले करे या हमारा टैक्स खाए तो हम क्या करे? फिर से पांच साल का इन्तजार? क्योंकि बीच में यदि हमने शिकायत कि तो कहा जायेगा कि आप जो कर रहे है कानून के खिलाफ है और आप इन्हें अगले चुनाओं में सबक  सिखा सकते है इनके खिलाफ वोट करके और अपने मनपसंद के उम्मीदवार  को जिताकर.क्या बेहूदा तर्क है यानी कि तब तक वो हमें लूटता रहे.और क्या गारंटी है कि उसके बाद आने वाला प्रतिनिधी वहाँ जाकर हमारी मांगों को पूरा करेगा.अभी जो सांसद है उन्हें भी तो जनता ने ही भेजा है पर क्या कर रहे है वो आज.भरष्टाचार रोकने के नाम पर एक ऐसा कानून ला रहे है जो उलटे इसे बढ़ावा देगा.ये काम वो हमारा प्रतिनीधि बनकर  कर रहे है.यानी एक ऐसा क़ानून जिसमे किसी भरष्ट सांसद के खिलाफ कि गई कोई शिकायत झूठी या फ़ालतू पाई जाती है तो शिकायतकर्ता को २ साल कि जेल होगी और सच पाई जाती है तो दोषी को केवल ६ या ७ माह कि ही सजा होगी, वो हमारी मर्जी से बन रहा है?ऐसा है जनता का जनता के लिए जनता के द्वारा shaashan ?हमने वहाँ लोगों को जिताकर भेजकर खूब देख लिया लेकिन वहाँ पिछले ६५ साल से माहौल ऐसा हो चूका है कि कोई भी अच्छा आदमी जनता के हित में फैसले खासकर के करप्शन के खिलाफ ले ही नहीं सकता है.क्योंकि उसकी कुछ चलती ही नहीं है.इसलिए अच्छा हो कि हम इस समस्या का एक परमानेंट या बहुत हद तक प्रभावी समाधान यानी जन लोकपाल को समर्थन दें.इसीलिए मेरा समर्थन किसी व्यक्ति  को न होकर इस बिल को है.क्योंकि यदि एक बार  ये मौका हाथ से निकल गया  तो मुझे नहीं लगता कि फिर कभी हम अपनी बात सही से रख पायेंगे.

Wednesday, July 13, 2011

भारी पड़ेगी ये खामोशी

वैसे तो आज कश्मीर पर एक पोस्ट लिखना चाहता था जो को मेरा प्रिय विषय भी है लेकिन आज टी.वी. पर देखी एक खबर ने थोडा विचलित कर रखा हैं. .कोयम्बटूर में आपसी झगडे के बाद एक युवक को चार युवकों ने सडक के बीचों बीच पहले बाईक से टक्कर मारी और फिर सिर पर भारी पत्थरों से वार कर उसकी जान ले ली.ये दृश्य चौराहे पर लगे सीसीटीवी कैमरे में ठीक उसी तरह कैद हो गये जैसे कुछ समय पहले पत्रकार जेडे की हत्या के दृश्य हमने देखे.लेकिन यह घटना थोडी अलग प्रकार की थी.कोयम्टूर में इस युवक की हत्या गोली मारकर नहीं बल्कि पत्थर मारकर की और हत्यारों ने इसके लिए पूरा समय लिया.वहाँ खडे सैकडों लोगों ने इस दृश्य को देखा लेकिन किसीकी हिम्मत नहीं हुई कि इन लडकों को रोक सके.टी.वी. पर भीड के रवैये को लेकर आलोचना हो रही थी लेकिन मैं सोचता हूँ कि वो लोग क्या सिर्फ इसलिए नहीं बोले कि वो डर रहे थे या कोई और कारण था.और यदि मैं वहाँ होता तो क्या कुछ कर पाता.
देशभर में इस तरह की घटनाएँ होती रहती है.छेडछाड हत्या मारपीट गैंगवार या लूट की घटनाएँ भरे बाजार में हो जाती है मगर लोग विरोध नहीं कर पाते.शुरूआत में मुझ पर ऐसी खबरों का कोई खास असर नहीं होता था.लेकिन चार पाँच साल पहले एक बार हमारे घर से मात्र तीन किलोमीटर दूर दिनदहाडे भरे बाजार में कुछ गुंडों ने तलवार से एक युवक की दोंनों हथेलियों को काट डाला था.तब पहली बार लगा कि यदि मैं वहाँ होता तो क्या करता.भीड का हिस्सा बन सब देखता रहता या क्षमताभर विरोध करता.सबसे पहले तो ख्याल आया कि ऐसा करने पर मेरी भी जान को नुकसान हो सकता था लेकिन यदि उस युवक की जगह मेरे घर का कोई सदस्य होता तो क्या तब भी मैं इस बात की परवाह करता कि सामने वालों के हाथों में तलवार है?नहीं,बिल्कुल नही.दूसरा ख्याल आया कि लोग क्या कहेंगे खुद मेरे घरवालों की क्या प्रतिक्रिया होगी.यही कि तुझे क्या जरूरत थी बीच में बोलने की.
 मुझे तो लगता है कई लोग इस कारण भी चुप रह जाते हैं की लोग क्या कहेंगे पर क्या लोगों की प्रतिक्रियाएं  किसीकी जान से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है.या फिर अब हम पहले से ज्यादा असंवेदनशील और स्वार्थी हो गए है.
                 फिर भी बीच बीच में कुछ अच्छे उदाहरण भी सुनने को मिलते है.कुछ दिन पहले मैं एक महिला के बारे में पढ़ रहा था जो गुजरात दंगों के दौरान अपने मुस्लिम पड़ोसियों को बचाने के लिए हिंसक भीड़ के सामने हसिया लेकर  खडी  हो गई और किसी तरह अपने मकसद में कामयाब भी हो गई.दिल्ली में एक २२ वर्षीय युवक को अपनी सहपाठी के साथ छेड़छाड़ करने वालों का विरोध करने पर जान गंवानी पड़ती है.वही जयपुर के एक सिख छात्र का अपहरण इसीलिए कर लिया जाता है की उसने अपने साथ पढने वाली एक लड़की के साथ कुछ बदमाशों द्वारा बदतमीजी  किये जाने का विरोध किया था बाद में इस छात्र के साथ मारपीट की जाती है और उसके केश भी काट दिए जाते है. इन लोगों की बहादुरी के हम प्रशंसक है इन्होने अपनी जान की परवाह नहीं की.लेकिन एक या दो लोगों की ही बहादुरी दिखने से कुछ नहीं होगा कई बार इसके गलत परीणाम भी हो सकते है जैसे की ऊपर के दो उदाहरणों में दिए गए है.साथ ही मैं मानता हूँ की जहां कुछ शारीरिक होने का डर हो या आपकी जान पर ही बन आये वहाँ आवेश में आकर कोई कदम उठाना  हमेशा समझदारी भरा नहीं होता.खासकर जब आप अकेले हों या अपराधी हथियारबंद हों हालांकि वहां भी ये सवाल मुझे परेशान करता है की यदि हमारे घर की किसी महिला के साथ बदतमीजी हो या हमारे घर के किसी सदस्य के साथ मारपीट हो तब भी क्या हम इस बात का ख्याल करेंगे? यानी की हम इस मामले में स्वार्थी है?लेकिन फिर भी ये मान लेने में कोई हर्ज नहीं की प्रत्येक इंसान की कुछ सीमायें भी होती हैं.
                      पर कोयम्बटूर की इस घटना में तो किसी हथियार का इस्तेमाल नहीं किया गया बल्कि इन लोगों ने शराब भी पी राखी थी  ऐसे ही मंबई में एक बार नई साल के जश्न के दौरान जब महिलाओं के कपडे फाड़े जाते रहे तब भी ऐसी कोई बात नहीं थी लेकिन वहाँ भी लोग चुप चाप सब  देखते रहे.कम से कम ऐसी परिस्थियों में चुप रह जाने का मुझे कोई कारण नहीं नजर आता.राजस्थान,हरियाणा,उत्तर प्रदेश.,मध्य प्रदेश,बिहार में तो इस तरह की घटनाएं होती रहती है.लोगों द्वारा शुरुआत में ही  विरोध न करने के कारण ही यहाँ दादाओं,मुन्नाओं,ताऊओ,चौधारिओं,बाहुबलिओं के हौसले इतने बढ़  गए है.
                  पुलिस हर जगह मौजूद नहीं रह सकती और न ही हमें ऐसी उम्मीद करनी चाहिए.हमें न तो सीमा पर जाकर लड़ना है और न ही आज अंग्रेजों के खिलाफ लड़ना है लेकिन हमारे आम जीवन में जब इस तरह की घटना हो तो वहाँ हमें उन सैनिकों या स्वतंत्रता  सैनानियों जिनकी बहादुरी की किस्से हमें रोमांचित करते है,की हिम्मत की कम से कम चौथाई हिम्मत तो करनी ही पड़ेगी तभी असामाजिक तत्त्व ऐसी वारदात करने से पहले हजार बार सोचने को मजबूर होंगे. ठीक है जेसिका हत्याकांड जैसी घटना के समय लोग तुरंत कुछ नहीं कर पाए लेकिन जब पुलिस  को गवाहों की जरुरत पडी तो कोई सामने नहीं आया और कुछ को गवाही के लिए तैयार भी किया गया तो वो भी मुकर गए.कारण चाहे जो भी हो लेकिन भीड़ की इसी मानसिकता का फायदा अपराधी उठाते हैं.पुलिस या प्रसाशन की बेईमानी या असंवेदनशीलता को हम चाहे जितना कोसें लेकिन सच तो ये है की जब जब भी हमारी बारी आई तो हम भी पीछे हट गए हैं.पुलिस और व्यवस्था को बिगाड़ने में हमारा भी हाथ है.यदि हम यूँ ही चुप रह गए तो एक दिन ये खामोशी हम पर ही भरी पड़ेगी.
                   ये सब लिखने के बाद भी मैं  ये ही सोच रहा हूँ की उस घटना के वक्त मैं होता तो क्या विरोध कर पाता और इसका परिणाम क्या होता और यदि नहीं कर पाता तो शायद ये इससे जन्मा अपराधबोध  मेरा पीछा ही नहीं छोडता.
       

Sunday, June 26, 2011

कनाडा से भारत तक......'बेशर्मी मोर्चा'

कनाडा के एक पुलिस अधिकारी द्वारा विश्वविद्यालयों की छात्राओं को दी गई एक सलाह की 'यदि लडकियां बलात्कार से बचना चाहती है तो उन्हें slut'(वैश्या) जैसे कपड़ों से परहेज करना होगा' के बाद दुनिया भर में इस पर जबरदस्त प्रतिक्रिया हई है.कनाडा,अमेरिका,ऑस्ट्रेलिया सहित अनेक देशों में महिलाओं ने 'slutwalk ' का आयोजन किया है जिसमे पुरुषों ने भी अच्छी भागीदारी की है.इन महिलाओं के अनुसार इन प्रदर्शनों के जरिये वे यह बताना चाहती है की बलात्कार जैसे अपराध कुछ पुरुषों की महिला विरोधी लम्पट मानसिकता का नतीजा है और उन्हें अपने
 मन मुताबिक कपडे पहनने का हक़ है.
           अब भारत में भी इस तरह कि ही  रैली के लिए तैयारियां चल रही है.डी.यु. में द्वितीय वर्ष की पत्रकारिता की छात्रा उमंग सभरवाल ने फेसबुक  के जरिये दिल्ली की छात्राओं से इस तरह की रैली में शामिल होने का आह्वान  किया है.इस  रैली का नाम उन्होंने '
बेशर्मी  
मोर्चा' रखा है.वही मुंबई में एक गैर सरकारी संस्था ने भी जुलाई के अंतिम सप्ताह में एक ऐसे ही विरोध प्रदर्शन का आयोजन करने का फैसला किया है.
     महिलाओं के लिए  ये कोई नई बात नहीं है की उनके कपड़ों से ही उनके चरित्र को आँका  जाता है.पढ़े लिखे पुरुषों में से भी कईयों की ये ही सोच है की महिलाओं के 'भड़कीले' वस्त्र पुरुषों की यौन उत्तेजना के लिए उत्प्रेरक का काम करते है जिससे की पुरुष खुद पर काबू नहीं रख पाते.वहीं कुछ महिलाओं का भी मानना है की जो महिलायें छोटे कपडे पहनती है उन्हें खुद से सती सावित्री  जैसे व्यवहार किये जाने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए.
            परन्तु मनोविज्ञान की माने तो बलात्कार जैसे अपराधों के पीछे दैहिक आकर्षण उतना बड़ा कारक नहीं है जितनी की पुरुषों की सदियों पुरानी वही सोच जो महिलाओं को हर हाल में दबाएँ रखना चाहती है.साथ ह़ी कई बार के अध्ययनओं में ये बात सामने आ चुकी है की बलात्कार की शिकार ज्यादातर वे ह़ी महिलायें होती है जो साड़ी या सलवार  सूट जैसे कपड़ों में होती है.कम कपड़ों वाला तर्क वैसे भी बहुत कमजोर है क्योंकि एक ८० साल की बुजुर्ग से लेकर ६ माह की बची तक कोई भी महिला आज के माहौल में सुरक्षित नहीं है.लेकिन फिर भी चाहे विकसित समझे जाने वाले पश्चमी देश हो या पिछड़े माने जाने वाले इस्लामिक राष्ट्र हो या फिर हों विकासशील भारत जैसे देश, महिलाओं को हर जगह पुरुषों की शिकारी के बजे शिकार को ह़ी दोषी ठहराने वाली मानसिकता का सामना करना ह़ी पड़ता है.
              इन सब बातों का विरोध महिलायें शुरू से करती भी रही है.हमारे देश में भी बहुत कुछ  इस बारे में लिखा जा रहा है.कुछ साल पहले दक्षिण भारत के एक शहर (नाम याद नहीं आ रहा) में कुछ इसी तरह के विरोध प्रदर्शन का आयोजन एक गैर सरकारी संस्था ने ह़ी किया था.जिसमे शहर की सबसे व्यस्त सड़कों पर लडकियां अलग अलग जगहों पर खडी हो जाती और वहाँ से गुजरने वाले लड़कों  को उसी तरह से घूरती जैसे लड़के लड़कियों को घूरते है.इसका मकसद लड़कों द्वारा लड़कियों को घूरे जाने की गंदी आदत का विरोध करना था क्योंकि इससे वे असहज महसूस करती है.इसके अलावा तहलका की निशा सुसन द्वारा श्रीराम सेना नामक एक हिंदूवादी संगठन के विरोध में चलाया गया एक कैम्पेन  भी बहत चर्चित रहा था.मंगलौर के एक पब  में लड़कियों की पिटाई करने वाले इस संगठन ने निशा के अभियान के बाद अपने आगे के ऐसे ही 'अभियान' वापस ले लिए थे.निशा का कैम्पेन  जिस तरह  विवादों में आ गया था वैसे ह़ी उमंग के द्वारा इस रैली का नाम बेशर्मी
मोर्चा रखे जाने पर कुछ लोगों ने अभी से आपत्ति करनी शुरू कर दी है.परन्तु उमंग का कहना है की ये नाम उन्होंने एक ग्रुप मीटिंग के बाद एकमत से चुना है ताकि लोग समझ जाए की हमारा मकसद क्या है और लड़कियों के छोटे कपड़ों का मतलब उनकी 'हाँ' न समझा जाये.
                मुझे लगता है की जब किसी भी गलत बात का विरोध करने के पारंपरिक तरीके काम न करे तो कुछ हटकर कदम उठाना  गलत नहीं है.बस ये ख़याल रहे की माहौल किस बुराई के खिलाफ बनाया जा रहा है.अभी भी जहाँ भी इस तरह के प्रदर्शन हो रहे है वहाँ इस मसले पर गंभीर  बहस  छिड गई है.लेकिन हमारे यहाँ कुछ लोग अभी से इसे प्रचार के भूखे लोगों का हथकंडा,संस्कृति के खिलाफ आदि मानने लगे है.पर चाहे जो हो कोशिश ये ह़ी होनी चाहिए की बहस इन अपराधों और इनके लिए महिलाओं को ह़ी जिम्मेदार  ठहराने वाली प्रवृति  पर ह़ी केन्द्रित होनी चाहिए.
                        कुछ महिलाओं को लग सकता है की इस तरह के विरोध प्रदर्शनों से पुरुषों की मानसिकता में कोई परिवर्तन नहीं आने वाला है.ये बात सही भी है लेकिन इस बहाने जो बहस चलती है तो लोग थोडा बहुत सोचने को मजबूर होते है.और मान लेते है की पुरुषों पर कोई फर्क नहीं पड़ने  वाला तो भी कम से कम वो महिलाएं तो इस बारे में गंभीर होंगी जिन्होंने पुरुषों की इन आदतों को सामान्य मान लिया है.
                     जहाँ तक बात है विरोध के तरीके की तो ये एक अच्छे उद्देश्य के लिए ह़ी किया जा रहा है.और पुरुषों की आपत्ति की  असली वजह विरोध  का तरीका नहीं है दरअसल उन्हें इन सब सवालों से ह़ी परेशानी है जो महिलायें उठा रही है और कम से कम इन बातों का विरोध महिलायें किसी भी तरीके से कर के देख ले,कुछ पुरुषों की गालियाँ तो उन्हें पड़ेंगी ह़ी,फिर चाहे वो कोई छात्रा हो या कोई साहित्यकार.यहाँ नेट पर भी इस तरह के उदाहरण भरे पड़े है.वही कुछ महिलाओं का कहना है की विरोध का ये तरीका अपनाने पर तो बलात्कार जैसा अपराध, जिस पर गंभीर बहस होनी चाहिए वो बहुत हल्केपन में लिया जायेगा.लेकिन ऐसा हैं नहीं क्योंकि  हलके में तो इसे अभी समाज ले रहा है.यदी हमारा समाज ये मानता है की बलात्कार और छेडखानी का कारण महिलाओं के छोटे कपडे ह़ी है तो इसका मतलब पहले से ह़ी महिलाओं के प्रति इन अपराधों को हलके में लिया जा रहा है.और इसी का तो विरोध किया जा रहा है. ऐसे विरोध प्रदर्शन यदि एक बहस का माहौल तैयार करते है तो इसमें बुराई क्या है.

Monday, May 9, 2011

हमारे जमाने में....

पहले ही बता दूँ की ना तो ये कोई गंभीर लेख है और ना ही किसी भी तरह से शिक्षाप्रद या जानकारीपरक है.ये केवल अपने अनुभव लिखने की तरह है ताकि आपको बाद में कोई निराशा ना हो और इसी बात को मेरे आगे के लेखों पर भी लागू समझिये.
     बुजुर्गों  की नई पीढी से यह शिकायत आम है की युवाओं  के पास उनके लिए समय नहीं है या वे उनकी बात नहीं मानते.एक हद्द तक उनकी ये बात सही है पर कई बार लगता है की वो ही  हमारी बात नहीं समझते.पर कुछ भी हो जब आप अपना थोडा समय उन्हें देते है तो कई बार बहुत सी रोचक बातें भी जानने को मिलती है.अक्सर उनकी ये बातें 'हमारे जमाने में...'से शुरू होती है.खासकर जब बातें गाँव से जुडी होती है.
                    वैसे तो हम शहरी लोगों के लिए गाँव की बहुत सी बातें आज भी नई ही होंगी लेकिन गाँव में भी पहले की तुलना में अब बहुत बदलाव आ चूका है.मेरे दादाजी जो की एक सेवानिवृत फौजी है कई बार इस बारे में बताते है.हम लोग तीस साल से ही शहर में रह रहे हैं यानी मेरे जनम से कुछ ही साल पहले.
                 सबसे पहले तो उनकी बातें शुरू होंगी आजकल के युवाओं के आलसीपन और कामचोरी को लेकर जिससे कई बार मैं सहमत नहीं हो पता हूँ लेकिन शारीरिक श्रम की जहां तक बात है वो लगता है की अब कम हुआ है कारण चाहे जो हो.उनके अनुसार पहले लड़के कुश्ती,पहलवानी में तो रूचि रखते ही थे बल्कि घर के कामों में भी पूरा हाथ बंटाते थे.एक सामान्य कद काठी का लड़का भी कई किलो मीटर दूर कुँए से ५-५ मटके पानी के ले आता था.तीन सर पर और दो कन्धों पर.बीमारियाँ बहुत कम होती थी और छोटी मोटी बीमारीओं की लोग परवाह नहीं करते थे.ये नहीं की आजकल के लड़के लड़कियों की तरह जरा मुहं में छाले हुए नहीं की हफ्ते भर के लिए मौन व्रत धारण कर बैठ गए.
                       दूसरी इनकी बातें होंगी आजकल की महंगाई को लेकर की कैसे पहले केवल 20  रुपये में महीने भर से ज्यादा का पूरे घर का राशन आ जाता था जबकि आज एक किलो चीनी तक नहीं आती.ठीक है की उस जमाने में 20  रुपये भी बहुत होते थे लेकिन ये सब सुनने में बड़ा अच्छा लगता है इसीलिए मैं  अपनी तरफ से खोद खोदकर भी ऐसी बातें पूछता हूँ.तीसरी बात शादियों को लेकर. एक बार दादाजी ने बताया की जब वे छोटे थे तो उनके पिताजी ने गाँव के एक गरीब की लड़की की शादी में 35  रुपये और कुछ कपडे दिए तो आस पास के गाँव में हंगामा मच गया था.पहले बारातें  आज की तरह एक दिन में  ही खा पीकर वापस  नहीं हो लेती थी बल्कि चार चार दिनों तक रुका करती  थी. जरा सोचिये लड़की वालों का क्या होता होगा.उस समय जब किसीके दहेज़ में साइकिल आ जाती तो लोग दूर दूर से उसे देखने के लिए आते.जिस लड़के की शादी में साइकिल आती वो वो उसे रोज धोता,साफ़ करता मगर महीनों तक इसे घर से बाहर नहीं निकालता.ये ही हाल तब था जब शुरू में रेडियो आया.जिस व्यक्ति के पास शुरू शुरू में रेडियो आ गया वो किसी से सीधे मुंह बात ही नहीं करता था.रेडियो को कंधे पर लटकाने के लिए वो एक लम्बी सी सुतली का प्रयोग करता और पूरे गाँव में शान से घूमता.अकड ऐसी की मानो रेडियो का आविष्कार ही इसीने किया हो.महिलाओं और दलितों की स्थिति में जो कुछ उन्होंने बताया मुझे नहीं लगता की आज भी इसमें कोई ख़ास अंतर आया है.इनके साथ भेदभाव अभी भी जारी है.
                        और ऐसा नहीं है की केवल बुजुर्गों के पास ही सुनाने को ये किस्से हो.हमारे माता पिता के पास भी 'अपने जमाने' के बारे में बताने को बहुत कुछ है.इनमे ज्यादातर बातें ७० के दशक की फिल्मों और उनके प्रति लोगों की दीवानगी की होती है.मेरे पापा बताते है की कैसे बच्चन की नई फिल्में देखने ले लिए वे दिनभर सिनेमाघरों की लइनों में खड़े रहते थे और कई कई बार तो एक ही फिल्म को दिन में दो या तीन बार भी देखते थे जैसे की दीवार और शराबी.उन्होंने बताया की साधारण शकल सूरत वाले राजेश खन्ना के प्रति जैसी दीवानगी लोगों खासकर के महिलाओं में हुआ करती थी वैसी फिर किसी हीरो को लेकर नहीं हुई(वास्तव में?).एक और बात जो मेरे लिए भी नई थी और कल ही मुझे पता चली की दिल्ली में एक बार लोकनायक जयप्रकाश नारायण की एक रैली को फ्लॉप कराने के लिए तत्कालीन सरकार ने राजकपूर की 'बोबी' को मुंबई से प्रिंट मंगवाकर आनन् फानन में दूरदर्शन पर प्रदर्शित कर दिया ताकि इसमें कम से कम लोग पहुंचे.बातें कई है पर अब ज़रा 'हमारे जमाने' की बातें भी तो कर ले.
                         हमारे जमाने में(बड़ा माझा आता है ये कहने में.)मुझे याद है कैसे एक रुपये की चार आइसक्रीम और चार पतंगें आया करती थी.त्योहारों का एक अलग ही माझा था.होली,दीवाली या संक्रांति पर जो हुल्लड़बाजी  देखने को मिलती थी अब कुछ महंगाई तो कुछ संयुक्त परिवारों के टूटने से सब फीका सा हो गया है.
                             टेलीविजन  से जुडी तो कई यादें है.शुरुआत में जब टी.वी. का नया नया दौर शुरू हुआ था तब मोहल्ले में हमारा दूसरा घर था जिसमें लकड़ी के शटर वाला टी.वी. था. शनिवार और रविवार को आने वाली ब्लैक &व्हाइट फिल्मों का लोग बेसब्री से इन्तजार करते थे.इनके बीच १५ मिनट का ब्रेक भी आता था जिसमे देश भक्ति गीत प्रसारित होते थे.तब दूरदर्शन पर एक प्रोग्राम आता था चिट्ठी-पत्री.इस प्रोग्राम को देखने के लिए भी मोहल्ले भर के बच्चे हमारे घर इकठ्ठा हो जाते थे.कई बार तो घर की साफ़ सफाई भी नहीं हो पाती थी.मम्मी बताती है की उस समय उन्हें एक ही कार्यक्रम सबसे अच्छा लगता था और वो था,डीडी का एतिहासिक ,जो कई बार आधे आधे घंटे तक भी चला करता था और जिसका कोई समय ही नहीं था,सोचिये कौनसा?
 जी हाँ.....
'रुकावट के लिए खेद है'
हा हा हा...कुछ याद आया?
इस कार्यक्रम के दौरान ही उन्हें कुछ चैन मिलता था.
                            एक और अंतर जो मुझे देखने को मिलता है वो है आजकल के बच्चे और उनकी परवरिश का तरीका.आजकल के बच्चे जहां विडियो गेम,मोबाइल और कंप्यूटर के शौक़ीन है,indoor गेम्स  खेलते है,हल्क और स्पाईडरमैन  के पोस्टर्स इनके कमरे में लगे होते है(इनके कमरा भी अलग होता है.)जबकि हमारे जमाने में ये सब इतना नहीं था(मतलब की फीलिंग ही दूसरी होती है.).पहले खुले मैदान बहुत थे.पक्की सड़कें नहीं थी.बच्चे बाहर गलियों में खेल सकते थे.आजकल पार्क भले ही बन गए है लेकिन वहाँ भी बौल  लाना मना है,साइकिल लाना मना है,घास पर चलना मना है जैसी हिदायतें लिखी रहती है.पहले बहुत कम बच्चे ऐसे दीखते थे जिनकी आँखों पर मोटे लेंस वाले चश्मे लगे हो.लगता है आजकल वाले ज्यादा ही पढ़ेसरे हो गए है.
                      आजकल की माएँ  भी बहुत बदल गई है(इसका मतलब ये नहीं की बच्चों के प्रति प्यार कम या ज्यादा हुआ हैं ).ये बात तो है की आजकल की सुपरमोम की तरह पहले की माएं बच्चों की छोटी मोटी बातों को उतनी गहराई से नहीं समझ पाती थी जो की सूचनाओं के ज्ञान की वजह से संभव हुआ है.ऐसा लगता हैं की आज के बच्चों की जिद पूरी करने को माँ बाप  खुद ही आगे रहते है.पर हमारे जमाने में ऐसा नहीं था.
                      बेचारे छोटे छोटे बच्चे थके  हारे पसीने से लथपथ स्कूल से लौटते और मम्मी जी गेट पर ही खड़ी मिलती,आते ही पहला सवाल-
होमवर्क मिला ??
हा हा हा....
बेचारे बच्चे की हालत खराब.लेकिन बात यही ख़तम नहीं होती, आगे भी-चल जल्दी से कपडे बदल,खाना  खा और पढने बैठ जा.आने दे तेरे पापा को बहुत बिगड़ गया है.
आजकल के बच्चों जरा कल्पना करके देखो.
                        और सोचकर देखिये आज से तीस चालीस साल बाद के बच्चों को हम आज की किन किन बातों के बारे में बताएँगे जिन पर वो आश्चर्य करेंगे.जब सब कुछ हमारे सामने ही इतनी तेजी से बदल रहा है.याद है मोटोरोला के वो ऐन्तीने वाले भारी भरकम हैण्ड सेट्स जब इन कमिंग  के भी ५-५,६-६ रुपये लगा करते थे.आज जिस तरह से पानी की किल्लत हो रही है कही ऐसा तो नहीं की जब हम इस जमाने के बारे में बच्चों को बताएं की कभी हम होली भी पानी से खेला करते थे और वो विश्वास ही न करे. 
                  
 
 
 
 
 
 
 
              
 

Monday, May 2, 2011

.....क्योंकि बहुत कुछ यहाँ 'फालतू' ही है.

एक नई फिल्म देखी, नाम है 'फालतू'.इस फिल्म में युवाओं को पढाई फालतू लगती है.फिल्म में ज्यादातर गाने फालतू में डाले गये है.एक्टिंग और निर्देशन दोनों फालतू टाईप के है.ऐसे निर्माता निर्देशकों को लगता है कि दर्शकों के पास बहुत सारा फालतू का समय और पैसा है.पर आजकल और भी बहुत कुछ फालतू का हो रहा है और माना जा रहा है.

आजकल सरकार को आए दिन अलग अलग माँगों के लिए होने वाले प्रदर्शन और बंद फालतू के लग रहे है वहीं जनता को सरकार की आपत्तियाँ फालतू लग रही है.नक्सलियों और माओवादियों को पूरा लोकतंत्र ही फालतू का लग रहा है.आतंकवादियों को इंसान फालतू नजर आते है वहीं आत्महत्या करने वालों को अपना जीवन ही फालतू नजर आता है.

महिलाओं को लगता है कि उन पर पुरूषों ने कई प्रतिबंध फालतू के लगा दिये है जिन पर वो सवाल उठा रही है वहीं पुरुषों को इनके सारे सवाल ही फालतू के नजर आ रहे है.

गभीर लिखने वालों को हल्का फुल्का लेखन फालतू लगता है वही हल्का फुल्का लिखने वालों को लगता है जब सरल भाषा में समझाया जा सकता है तो फालतू में गंभीर क्यों लिखे.युवाओं को तो हिंदी भाषा भी फालतू की लगने लगी है. तो बच्चों को ईमानदारी और सादगी की सीख ही फालतू लगती है.

कुछ लोगों को हेलमेट पहनने का नियम फालतू लगता है तो कहीं बिगडेल नशेडी अमीरजादों को कार ड्राइव करते समय फुटपाथ पर सोये हुए गरीब ही फालतू नजर आते है .पुलिस वालों को जनता की कंपलेन फालतू नजर आती है.कई लोग जिन्हें अपने शरीर की चर्बी फालतू नजर आती है जिम जाते है तो कईयों को जीभ पर कंट्रोल करना फालतू लगता है,खा खा के इनकी हालत ऐसी हो गई है कि आधी सडक फालतू में घेर के चलते है कल को हो सकता है पीठ पर एक तख्ती लगानी पडे-जगह मिलने पर ही साइड दी जाएगी.

मेरे दादाजी को अखबार में विज्ञापन फालतू लगते है तो दादीजी को राशिफल के कॉलम के अलावा पूरा अखबार ही फालतू लगता है.वृद्धाश्रमों की बढती संख्या और बागबान जैसी फिल्में देखकर तो लगता है औलादों को अपने बुजुर्ग माँ बाप भी फालतू लगने लगे है.तो कई लोगों को बेटियों को पढाना ही फालतू लगता है.

यहाँ ब्लॉगिंग में भी कई लोग धर्म के नाम पर झगड रहे है वही कईयों को लगता है कि ये झगडे ही फालतू के है इनसे दूर रहा जाए जबकि इन झगडने वालों को लगता है जो हमारे बीच बोल ही नहीं रहा वो ब्लॉगर ही फालतू का है.लीजिए हमने भी एक फालतू की चेप ही दी.इसे झेल जाइये.

Tuesday, April 26, 2011

MLM का बढता चलन

कुछ समय पहले हमारे एक किरायेदार भैया कई दिनों से पीछे पडे हुए थे एक स्कीम को लेकर.आप सात हजार रुपये दीजिए आपका रजिस्ट्रेशन एशिया की टॉप फाइव कंपनियों में से एक हमारी कंपनी में हो जाएगा इसके बाद आपको पाँच मेंबर जोडने होंगे और प्रत्येक ज्वायनिंग पर आपको तीन तीन सौ के चैक मिलेंगे फिर उन मेंबरों को भी 5-5 मेंबर जोडने पडेंगे और जैसे जैसे ये चैन बढती जाएगी आपको फायदा मिलता जाएगा.सारा हिसाब समझाया कि कैसे कुछ ही महीने में आप करोडपति बन जाएँगे.लेकिन मेंने इन सबके बारे में पहले भी सुन रखा था सो किसी तरह टालता रहा.इस चेन सिस्टम को एम एल एम यानी मल्टी लेवल मार्केटिंग कहते है आजकल ऐसी कंपनियाँ लगभग हर शहर में फैलती जा रही है.

ऐसे प्लान सुनने में बडे आकर्षक लगते है और समझाने वालों की भी दाद देनी पडेगी वो बताते ही इस तरह हैं कि आदमी चाहें जितना समझदार हो एक बार लालच के चलते इनके झाँसे में आ ही जाता है यहाँ तक की कई लोग लालच में आकर पैसा ब्याज पर लेकर भी इन स्कीमों में लगा देते है.लेकिन शुरू में तो कुछ फायदा होता है पर बाद में पता चलता है या तो कंपनी ही भाग गई या काम ही ठप्प पड गया यानी मेंबर ही नहीं मिल रहे.जितनी रकम लगाई उसमें से आधी ही वापस मिली बाकी डूब गई.यही नहीं कई कंपनियाँ तो सदस्यता नवीनीकरण के नाम पर फिर से कुछ रकम झटक लेती है.कई कंपनियों की धोखाधडी और रातोंरात भागने की खबरें आ चुकी है लेकिन फिर भी लोग सबक लेने को तैयार नहीं हैं.
ऐसा नहीं है सभी कंपनियाँ फर्जी ही है कुछ कंपनियाँ लंबे समय से जमी भी हुई है जो सदस्यता राशि जमा कर अपने उत्पाद बेचने के लिये भी अपने मेंबरों को देती है जिन पर उन्हें कुछ कमीशन मिलेगा लेकिन ये प्रोडेक्ट बहुत महँगे होते है साथ ही रोजमर्रा में कम ही उपयोग में लाए जाते है यही कारण है कि कई लोग जो बहुत उत्साह से इनसे जुडते है बाद में उदासीन हो जाते है और अच्छी भली रकम गँवा बैठते है.ये एक तरीके से संबंध बिगाडू काम भी है कई लोग जो अपने मित्रों रिश्तेदारों को मेंबर बना लेते है वो खुद के साथ साथ दूसरों का भी नुकसान कराते है और इसी कारण कई बार संबंधों में खटास भी आ जाती है.जहाँ निवेश कम जोखिमपूर्ण और कंपनी विश्वसनीय हो वहाँ बात अलग है पर मेरा तो मानना है कि इन पचडों से बचना ही सही है वर्ना खाया पीया कुछ नहीं गिलास तोडा बारह आना.

.......तो फिर आप ही बताइये क्या करे?

लैंगिक असंतुलन और कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के जितने भी ऊपाय है उनमें लडकियों को आत्मनिर्भर बनाने,बेटा बेटी में अन्तर न करने,पुरुषों द्वारा महिलाओं का सम्मान करने,दहेज जैसी परंपरा को खत्म करने,बेटियों द्वारा माँ बाप की अर्थी को कंधा देने की परंपरा की शुरुआत करने जैसी बातों पर बल दिया जा रहा है.हमने तो लोगों को ये तक समझाते देखा है कितनी ही कल्पना चावलाओं और किरण बेदियों को हमने संसार में आने से रोक दिया.तो क्या इनमें महिलाओं की क्षमता,उन्हें 'खर्च' न समझकर 'कुमाउँ पुत्री' समझने और असमानता खत्म करने का आह्वान आपको नहीं दिखाई देता?
एक और मासूम सा प्रश्न बहन क्या केवल इसलिये चाहिये ताकि वो भाई को राखी बाँध सकें???भई वाह! वैसे बाता दूँ कि स्वार्थ स्वार्थ में फर्क होता है भाई को बहन की कमी महसूस हो रही है तो यह उसका एक स्नेहिल स्वार्थ है कोई भी भाई समझ सकता है जिसकी बहन न हो.कलाई सूनी रह जाने का प्रयोग प्रतीकात्मक है .


अभिशाप नहीं वरदान है,बेटा बेटी एक समान,अजन्मी बेटी की पुकार जैसे नारो द्वारा आम आदमी तक ये ही बात पहुँचाई जा रही है.उँची जाति वाले लडके जो लडकियों को दुत्कारते रहे है उनका घमँड अब टूट रहा है कुछ समय पहले किरन बेदी ने भी लडकियों के एक समूह से ये बात कही थी.लेकिन अब मैं कह रहा हूँ तो इसका कोई दूसरा ही अर्थ लिया जा रहा है.
इतिहास में लडकियों की संख्या कम होने पर बहुपति प्रथा,अनैतिक व्यापार,बाल यौन शोषण आदि बढे है.चीन में हाल ही में जब लडकियों की संख्या अचानक से बेहद कम होने लगी तो वहाँ भी बलात्कार,यौन शोषण,अपहरण आदि घटनाओं में वृद्धि हो गई और वहाँ परिवार नियोजन के सख्त उपाय किये गये.ये तथ्य सच है.और प्राकृतिक असंतुलन व मानवता के खत्म होने की ही निशानी है.चलिये ये तथ्य न रखें तो आप ही बताइये आम आदमी को ये बात कैसे समझाऐ?इतना भर कह देने से काम नहीं चलेगा कि नेचुरल इंबैलेंस का खतरा है और न ही उसके समझ में आएगा.
फिर भी फिर भी आपकी बात समझ रहा हूँ.आपका कहना है कि इन तथ्यों को रखने से समाज में एक गलत संदेश जा रहा है तो ये मेरे लिये भी सोचने का विषय है कि कैसे.मगर आप रूकिये तो सही, सुनिये तो सही आप तो मैंने कुछ कहा और पहले ही अपने हिसाब से तय करने बैठ गये कि इसका मतलब ये और उसका मतलब वो.तो आप ही बताएँ हम अपनी बात कैसे कहे?