Wednesday, March 28, 2012

क्या हम मुसलमानों को आतंकवादी समझते हैं ?

यह  सवाल कोई पहली बार मन में आया हो ऐसा नहीं हैं बल्कि कई मौकों पर जब मुस्लिमों के प्रति भेदभाव या उन्हें मुख्यधारा  में लाने की बात की जाती है तब ये बात अक्सर उठाई जाती है की मुस्लिमों को आतंकवादी क्यों समझा जाता है या उन पर शक क्यों किया जाता हैं.किसी आतंकवादी घटना या बम ब्लास्ट आदी के बाद तो अक्सर कई लोगों द्वारा पहले ही अपील की जाने  लगती है की पूरी कौम को बदनाम  मत कीजिये या आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता आदी आदी.परन्तु क्या सचमुच हम ऐसी घटनाओं के बाद मुस्लिमों पर शक करना शुरू कर  देते हैं या उन्हें आतंकी ही मानने लगते हैं?
            कुछ लोग सचमुच ऐसा करते होंगे पर पता नहीं क्यों मुझे हमेशा लगता है की ये बातें  कुछ ज्यादा ही बढ़ा चढ़ाकर की जाती है इस हद्द तक की मुस्लिम समाज खुद को सचमुच असुरक्षित महसूस करने लगे.वैसे आज हिन्दू मुस्लिम कोई बहुत प्रेम से भले ही न रह रहे हों लेकिन ये भी सच है की अब ये कुछ ख़ास लड़ भी नहीं रहे है बल्कि पहले की अपेक्षा अब दूरियां कम ही हुई हैं.देखा जाए तो अब सभी साथ खाते पीते,उठते बैठते  और काम धंधा करते हैं.हिन्दू हों या मुस्लिम दोनों ने ही अब धर्म के नाम पर राजनीति करने वालों को भाव  देना बंद कर दिया हैं.भाजपा को उग्र हिंदुत्व  का रास्ता छोड़ना पड़ा है,संघ अपने घटते स्वयंसेवकों की वजह से चिंतित है तो वहीँ मुस्लिमों ने भी तुष्टीकरण की राजनीति करने वालों की बजाय विकास की  बात करने वालों को तरजीह देना शुरू कर दिया है.हालिया उत्तर प्रदेह विधानसभा चुनावों में मुस्लिम आरक्षण या बाटला हाउस एनकाउन्टर जैसे मामले उठाकर मुस्लिमों की सहानुभूति(और वोट भी) बटोरने के कांग्रेस प्रयासों पर वहाँ के मुसलामानों ने पानी फेर दिया हैं.और ये सब एक तरह से लोकतंत्र के लिहाज से अच्छा ही है.लेकिन फिर भी ये बात तो सच है की मुस्लिमों के साथ विभिन्न स्तरों पर भेदभाव होता है और खूब होता है.लेकिन क्या ऐसा केवल उनके मुसलमान होने की वजह से ही है या ये सब क्या केवल मुसलमान ही सह रहे हैं?मुझे लगता है की इस  तरह के भेदभाव के शिकार और भी बहुत से लोग हैं न की केवल मुसलमान.और मुझे नहीं लगता की मुसलामानों के साथ भेदभाव केवल उनके अलग धर्म के कारण हो रहा है,फिर चाहे वह पुलिस द्वारा निर्दोषों को सताने की बात हो या बैंकों द्वारा खाता  खोलने या ऋण देने में आनाकानी करने की बात हों या मुस्लिमों को किराए पर मकान या कमरा देने से मना करने का मसला हो.
              पहली बात तो ये की आम गैर मुस्लिम भारतीय मुसलामानों को आतंकवादी नहीं मानता है.हाँ कुछ लोग गलत हैं जो की कहीं  भी हो सकते है खुद मुस्लिमों में बहुत से ऐसे होंगे जो दूसरों से नफरत करते होंगे या उन्हें काफिर मानते होंगे.जहाँ तक बात है मुसलामानों को आतंकी बताने की तो मेरे ख़याल  से किसीको आतंकी कहने या कट्टरवादी  कहने में बहुत फर्क है.कुछ इस्लामिक रिवाजों और उनके कठोरता से पालन के कारण मुस्लिमों को कट्टर समझा जाता है न की आतंकी.आमतौर पे मुस्लिमों के बारे में लोगों की ये धारणा रहती है की वो धर्म को हर मामले में पहले ही रखते है जो की मेरे हिसाब से पूरी तरह गलत भी नहीं हैं.आप कह सकते हैं की कुछ और समुदाय भी धार्मिक रिवाजों का कठोरता से ही पालन करते हैं जैसे की जैन धर्म को मानने वाले लोग नियम कायदों के पक्के होते हैं.लेकिन मुसलामानों में बुरका,खतना,पांच बार नमाज,रोजे,मांसाहार यहाँ तक की कुछ त्योहारों पर घर पे ही जानवरों को हलाल करने आदि कुछ बातें ऐसी हैं जो उनकी  एक कट्टर छवि ही पेश करते हैं (लेकिन स्पष्ट करना चाहूँगा की  यहाँ मैं रिवाजों के सही या गलत होने की बात नहीं कर रहा हूँ,वो एक अलग मसला है).यही कारन है की मुस्लिमों की छवि ही ऐसी बन गई है.लेकिन ये भी सच है की जैसे  जैसे मुस्लिम आगे आ रहे है उनके प्रति लोगों का दृष्टिकोण भी बदल रहा है.
              फिर भी यदि कोई मुस्लिमों को समझने या उनके प्रति सोच बदलने या स्वस्थ दृष्टिकोण अपनाने का  आह्वान करता है तो मुझे भावना के स्तर पर कोई असहमति नहीं है वरन समर्थन है लेकिन ये इस तरह से न हो की सामने वाला खुद को उपेक्षित समझने लगे और दूसरों को अपना दुश्मन.जबकि आमतौर  पर खुद मुस्लिम ऐसा तरीका नहीं अपनाते.
              अभी एक मामला सामने आया है.दिल्ली में इस्रायली दूतावास की कार में विस्फोट के मामले में एक पत्रकार सैयद मोहम्मद काजमी को गिरफ्तार किया गया है.वहीं कुछ अति उत्साही धर्मनिरपेक्षतावादियों ने पहले ही पुलिस पर आरोप लगाना शुरू कर दिया हैं की काजमी को  बेवजह परेशान किया जा रहा है.हालांकि जिस तरह की ख़बरें मीडिया में आई है उससे ये मानना मुश्किल है की काजमी बेकसूर है.वहीं उनका पक्ष लेने वालों ने कोई ठोस कारण भी नहीं दीया जिससे लगे की पुलिस यहाँ गलत है.खैर  होने को कुछ भी हो सकता है देखते है आगे क्या होता है.लेकिन फिर भी मेरा इस बात से कोई इनकार नहीं है की पुलिस में बहुत से ऐसे लोग है जो मुसलामानों के प्रति दुराग्रह रखते है और कई बेक़सूर मुसलामानों को सताया भी जाता है जांच के नाम पर.लेकिन फिर सवाल ये ही है की पुलिस किसकी सगी है?उसे तो कई  बार ये दिखाना ही होता है की देखो काम हो रहा है फिर चाहे निर्दोषों को ही गिरफ्तार क्यों न करना पड़े.इफ्तिखार गिलानी,सीमा आजाद और उनके पति से लेकर विनायक सेन तक लम्बी लिस्ट है.जरा नक्सलवाद और माओवाद प्रभावित इलाकों में जाकर देखा जाए की पुलिस निरीह  आदिवासियों के साथ कैसे पेश आती है.यही नहीं दिल्ली,राजस्थान और म.प. जैसे राज्यों में कई इलाके ऐसे हैं जिन्हें अब 'मिनी बिहार' कहा जाने 
 लगा है क्योंकि यहाँ बिहार और उड़ीसा से आये मजदूर बहुत बड़ी संख्या में रहने लगे है.इन इलाकों के आस पास कोई चोरी या हत्या की घटना होती है तो पुलिस किसी भी बिहारी को शक के आधार  पर ही थाने ले जाती है और प्रताड़ित करती है.गाँव में दलितों के साथ पुलिस क्या करती है बताने की जरुरत नहीं.ये लोग भी अपमानित होने के बाद कुछ नहीं कर पाते.न जाने अब तक कितने लेखक,पत्रकार,सामजिक कार्यकर्ताओं को पुलिस ने झूठे आरोप लगाकर फंसाया है.ये मामला पुलिस के चरित्र  का  है.पुलिस सभी के लिए उतनी ही बुरी और असंवेदनशील है न की सिर्फ मुसलामानों के लिए.और कुछ आतंकी घटनाओं में हिन्दू आतंकी भी पकड़ में आये हैं.जाहिर सी बात है इसके लिए दूसरों से भी पूछताछ की गई होगी उन पर भी शक किया गया होगा.
               बैंकों परे भी  आरोप लगाया जाता है की मुस्लिमों के खाते खोलने और उन्हें ऋण दिने में आनाकानी करते है.ये बात एकदम से हजम होने वाली नहीं है अगर मुसलमानों को बात इस तरीके से कही जाये तो क्यों न उनको लगे की  हमसे भेदभाव बरता जाता है.बैंक और खासकर निजी बैंक तो अपने व्यावसायिक हितों को ही सबसे ऊपर रखते है.फिर उन्हें ग्राहक के धर्म से क्या लेना देना?हो सकता है कई बार मुस्लिम इस्लामिक उसूलों में आस्था  के कारण ब्याज वाला कोई लाभ न लेना चाहते हों और इसी कारण खाता खुलवाने या बैंक की दूसरी योजनाओं क लाभ लेने के लिए वो स्वयं आगे न आते हों?वहीं लोन तो किसीका भी अस्वीकृत हो सकता है जैसा की ये बात तो बैंक खुद मानते है की कमजोर आर्थिक स्थिति के चलते कई बार मुसलामानों को भी ऋण देने से मना कर दिया जाता है जो की किसाथ भी हो सकता है बल्कि कई बार तो अच्छी आर्थिक स्थिति के बावजूद ऍफ़.आई. नेगेटिव हो जाती है.धर्म इसमें क्या करेगा?फीर भी हो सकता हैं गाँव में कुछ सरकारी बैंक मुसलामानों से  भेदभाव करते हो लेकिन मेरा व्यक्तिगत अनुभव है के गाँव में हर क्षेत्र में दलितों के साथ कही ज्यादा भेदभाव होता है जबकि मुसलामानों के साथ एक दूरी तो बरती जाती है पर भेदभाव उतना नहीं होता.यहाँ तक की एक स्वर्ण और मुसलमान एक दुसरे के शादी जैसे अवसरों पर भी आते जाते हैं जबकि दलितों को अडने ही नहीं दिया जाता स्कूलों में भी दलितों के बच्चों  के साथ ज्यादा दुर्व्यवहार किया जाता है.
              एक बार और अक्सर सूनी जाती है की मुसलामानों को कमरा किराये पर नहीं दिया जाता है.तो भाई इसका कारण भी केवल दुसरे धर्म क होना ही नहीं है.यहाँ तो कई बार एक ब्रह्मण राजपूत को रूम नहीं देता है तो कई बार राजस्थानी किसी बंगाली को किराये पर नहीं रखता.बताइए क्या किया जाए?....कई खुद मुस्लिम ये चाहते है की किसी मुस्लिम के घर या मुस्लिम बस्ती में ही रहा जाए.कई परिवार तो ऐसे है जो सिर्फ मांसाहारी होने की वजह से किसीको भी किराये पर नहीं रखते.ऐसा नहीं है की केवल आतंकवादी समझकर  ही रूम नहीं दिया जैसा की कई लोगों द्वारा प्रचारित किया जाता है.वहीं बहुत से लोग ऐसे भी है जिन्हें मुस्लिमों को किराये पर रखने में कोई दिक्कत नहीं होती जिनमें से एक हम भी हैं.इसलिए सच केवल उतना ही नहीं हैं जितना की बताया जा रहा हैं.
कश्मीरियों क दर्द नहीं समझते?
इस विषय को भी धर्म  के चश्मे से ही देखा(और दिखाया भी) जाता है.मैं इस बात से सहमत हूँ की हम कश्मीरियों के प्रति असंवेदनशील हैं जबकि उन्हें सैनिक शाशन में रहना पड़ रहा है जहाँ आये दिन कर्फ्यू लगा रहता है.लेकिन क्या इसका कारण अधिकाँश कश्मीरी जनता का मुस्लिम होना है?और हम किसके प्रति संवेदनशील है?पूर्वोत्तर के लोगों,महाराष्ट्र के आत्महत्या को मजबूर किसानों,बुंदेलखंड के सूखा प्रभावित लोगों में से किसके प्रति हमने विशेष सहानुभूति दिखाई है?भारत की ज्यादातर जनता खासकर युवा कश्मीर को केवल उसी रूप में जानते  है जैसा की फिल्मों में दिखाया जाता हैं जहाँ हीरो हेरोइने पिकनिक मनाने जाते हैं और बर्फ से खेलते हैं,गाना गाते है.इसके अलावा बस उन्हें ये पता है की पकिस्तान वहां आतंकियों को भेजता रहता है जिनसे सेना को निपटना होता है.इसके अलावा न उन्हें कश्मीरियों से विशेष लगाव है(या नफरत है) और न ही कश्मीरी पंडितों से.हां धर्म की राजनीति करने वालों की बात अलग हैं.
             बहुत से कश्मीरी आज भी देश के अलग अलग कोनों में रह रहे हैं जिनमें ज्यादातर युवा हैं,कुछ पढ़ाई करते हैं,कुछ छोटी मोटी नौकरी करते हैं तो कुछ कश्मीरी शॉल  आदी बेचने क काम करते हैं .कई  कश्मीरी फ़ौजी और उनके रिश्तेदार सिविल में किराये पर रूम लेकर रह रहे हैं यहाँ तक की दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में तो बहुत से कश्मीरी लड़के व्यावसायिक परिसरों में सिक्योरिटी गार्ड तक लगे हुए हैं.क्या हमने इन्हें आतंकी कहकर और मार मार कर भगा दिया?क्या हम इन पर विश्वास नहीं करते?लेकिन वहाँ तो काश्मिरी युवाओं को ये बताया जा रहा है की तुम बाहर कमाने जाओगे तो तुम्हे आतंकवादी बता दिया जाएगा,लोग तुम्हें मारेंगे.अब ऐसे में नफरत पैदा नहीं होगी तो और क्या होगा?इसमें हमारे साथी वामपंथी सबसे  आगे हैं(जो हुसैन की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की तो वकालत करते हैं पर तसलीमा के लेखन के 'बाज़ार पक्ष' पर गौर करने की सलाह मुफ्त में देते हैं. ).अरे कुछ लोग हर जगह गलत होते हैं.कश्मीर में  कौनसे सब के सब संत ही हैं?
           अंत में ये ही कहना चाहूँगा की ऊपर लिखी सारी बातों क अर्थ ये नहीं की  हमारे भीतर  सुधार  की कोई जरुरत नहीं हैं या हमारे  बीच गलत लोग हैं ही नहीं .यदि कोई मुस्लिमों के प्रति गलतफहमी दूर करना चाहता है तो उसका स्वागत हैं.शिकायत केवल उनसे है जो एक बैलेंस बनाकर नहीं रखते.ये नहीं की बस...'हाय मुसलामानों को जीने दो' वाले नारे लगाने शुरू कर दिए जाए इससे तो अल्पसंख्यक खुद को एक निश्चित खांचे में ही बंद करके रखेंगे.'धर्म खतरे में हैं' जैसा नारा हिंदुत्वा या इस्लाम के नाम पर अपना उल्लू  सीधा करने वाले अक्सर लगाते है लेकिन मुझे नहीं लगता की अब इससे कुछ ख़ास फर्क पड़ता हैं.उदाहरण के लिए आज गिलानी या गिरिराज किशोर एक दुसरे के धर्म या उन्हें मानने वालों के बारे में कुछ कहें तो तो हिन्दू या मुसलमान कोई ख़ास ध्यान नहीं देंगे.लोग इन्हें गंभीरता  से लेंगे ही नहीं.लेकिन जो लोग सेकुलर हैं या जो हर धर्म को ही अफीम मानते हों कम से कम वो तो एक संतुलन  बनाकर रखें क्योंकि उनकी बात ज्यदा ध्यान से सूनी जाती हैं.अभी तो एक समुदाय को  दबा कुचला बताया जा रहा है जबकि दुसरे को उसके दुश्मन के रूप में पेश किया जा रहा हैं इससे समस्या सुलझेगी या और ज्यादा बढ़ेगी?