Saturday, July 28, 2012

न हर जगह हिंसा चल सकती है न अहिंसा न नारीवाद



गुवाहाटी छेडछाड प्रकरण के बाद महिलाओं के प्रति समाज का रवैया या उससे भी बढकर उनकी सुरक्षा का मुद्दा एक बार फिर से बीच बहस आ गया है.यूँ तो गुवाहाटी वाली घटना कोई अनोखी नहीं थी सिवाय इस बात के कि इसे भडकाने में वहाँ मौजूद पत्रकारों का भी हाथ था(वैसे इसका अंदाजा सभी को पहले से ही रहा होगा) जो कि इसे और गंभीर बना देती है लेकिन फिर भी इस घटना पर जिस तरह की प्रतिक्रिया हुई वह महत्तवपूर्ण है.पहले इस विषय पर उतनी चर्चा नहीं होती थी लेकिन अब महिलाएँ पढने या नौकरी करने के लिए घर से बाहर निकल रही है जाहिर सी बात है सुरक्षा के सवाल और गहरे हो गए हैं.इसमें कोई शक नहीं कि इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए लडकों की परवरिश में बुनियादी बदलाव तो जरूरी है ही लेकिन लडकियों को मानसिक व शारीरिक रुप से मजबूत बनाना भी उतना ही जरूरी है ताकि ऐसी कोई अनचाही स्थिति आने पर वह उसका मुकाबला डट कर कर सके.आत्मरक्षा के लिए कुछ हद तक हिंसा भी जायज़ है क्योंकि यह दूसरों को चोट पहुँचाने के लिए नहीं बल्कि खुद को बचाने के लिए है.लेकिन ब्लॉगजगत में कुछ पोस्टों पर हुए विवाद पर मुझे हैरानी हैं कि इसमें भी हिंसा बनाम अहिंसा वाला मुद्दा बीच में डाला जा रहा है.दरअसल आप जिस भी विचार वाद या सिद्धांत को मानते हो लेकिन आप चाहेंगे कि उसे हर जगह लागू किया जाए तो ये संभव नहीं है फिर चाहे वह हिंसा,अहिंसा नारीवाद या कोई भी 'वाद' हो.शीर्षक में जोडना संभव नहीं लेकिन बता दूँ कि मैं यह बात हर वाद के संदर्भ में कह रहा हूँ.क्योंकि लगभग हर वाद के समर्थक कई बार अतिवाद के शिकार हो जाते हैं.अभी कुछ दिन पहले एक वामपंथी लेखक का कोई लेख पढा जिसमें उन्होने 'कोलावेरी डी' गाने के हिट हो जाने को पूँजीवाद की विजय से जोड दिया ठीक इसी तरह अमिताभ बच्चन द्वारा गुजरात पर्यटन को बढावा दिए जाने के लिए किये जाने वाले विज्ञापनों के कारण उन्हें मोदी का समर्थक मान साम्प्रदायिक घोषित कर दिया.ये शायद सेकुलरवाद के लक्षण होंगे.कुछ कुछ ऐसा ही मुझे यहाँ हिंसा बनाम अहिंसा वाले मुद्दे को बीच में लाये जाने से लग रहा है और जोर देकर कहना चाहूँगा की मुझे ऐसा लग रहा है,हो सकता है की मैं ही बात को समझ नहीं पाया हूँ लेकिन जो लगता है उसे व्यक्त करना भी जरूरी समझता हूँ.
                     अब एक बार बाकी बातों को छोडिये,एक उदाहरण रखना चाहूँगा।अभी कुछ समय पहले देश ने अग्नी-5 मिसाइल का परीक्षण किया था उस समय टी.वी. पर रक्षा विशेषज्ञ भरत वर्मा ने बहुत अच्छी बात कही की हम कोई युद्ध का वातावरण नहीं बना रहे बल्कि एक 'शक्ति संतुलन' बना रहे हैं ताकि हमारा शत्रु यदि हमसे ज्यादा शक्तिशाली है तो भी उसे हम पर हमला करने से पहले ये जरूर लगेगा की सामने वाला मुझे भी अच्छा ख़ासा नुक्सान पहुंचा सकता है और इसी कारण वह हम पर जल्दी से हमला नहीं करेगा. जब हमारे पड़ोसी देश अपनी ताकत बढ़ा रहे हैं तो हम ये सोचकर नहीं बैठ सकते की हम बुद्ध या गांधी के देश के हैं और अहिंसा ही हमारा धर्म है.हमें एक शक्ति संतुलन स्थापित करना होगा और जवाबी हमले के लिए भी तैयार रहना होगा ताकी शत्रु देश हमें नुक्सान न पहुंचा सके.भरत वर्मा की बात से तो लगता है की आज के जमाने में तो यदी हम कमजोर हैं तो ही हम हिंसा या हिंसक माहौल को निमंत्रण देते हैं जबकि अपने आपको मजबूत बनाते हैं तो हिंसा के अवसर अपने आप कम हो जाते हैं.(वैसे मेरा तो मानना है की प्रत्यक्ष हिंसा से भी ज्यादा खतरनाक तो एक हिंसक माहौल या कहें दहशत भरा माहौल होता है,महिलाओं ही नहीं हम सबके लिए जरूरी है की हम खुद को इतना मजबूत बनाए की थोड़ी बहुत दहशत हो तो बुरे लोगों में ही हो ) इसलिए यदि महिलाओं को भी मानसिक और शारीरिक रूप से मजबूत बनाया जाए तो शरारती तत्वों पर कुछ लगाम लग सकती है.हालांकि पूरी तरह तो नहीं पर छेड़छाड़ जैसी घटनाएं उतनी सामान्य नहीं रहेगी जितनी अभी है या उनकी गंभीरता कम हो जायेगी.कुछ नहीं से अच्छा है कुछ तो हो.वैसे कहने को तो और भी बातें कही जा सकती है की इस तरह की घटनाओं के लिए खुद महिलाओं लड़कियों या उनके कपड़ों को दोष न दिया जाए लेकिन उतना कोई मतलब नहीं है ये सब कहने का ज्यादा जरूरी है की महिलायें खुद ही ऐसी बातों पर धयान देना बंद कर दे.
                   खैर ये तो बात हुई अहिंसा की कि हम हर जगह अहिंसा की नीति से ही समाधान नहीं पा सकते.लेकिन क्या हिंसा भी कोई समाधान है ?कई बार दो देश आपस में लड़ते हैं खूब खून खराबा होता है लकिन अंत में टेबल पर आकर समझौता करना पड़ता है इसी तरह परिवार के दो सदस्यों में ही कई बार सिर  फुट्टवल की नौबत आ जाती है उस समय इनके पास भी अपनी अपनी हिंसा को जायज ठहराने के कारण रहे होंगे लेकिन बाद में दोनों को ही पछताते देखा जाता है.देखा जाये तो उद्देश्य तो सबका एक अहिंसक समाज का निर्माण ही हैं और महिलाएं तो खासतौर पर कभी नहीं चाहेंगी की समाज में हिंसा का वातावरण बने.लेकिन ये बात बुरे लोगों को समझ नहीं आती,जो शोषण करता है वह तो इसी बात पर सैडिस्टिक आनंद अनुभव करता है की हमसे कोई दब रहा है,डर रहा है.बल्कि हमारा विरोध न करना उनके हौसले बढाता ही है.यदी छेड़छाड़ करने वालों की ही बात करूँ तो महिलाओं के प्रति इस अपराध को ख़त्म करने के लिए ये जरूरी है की लड़कों की परवरिश इस तरह की जाये की वे महिलाओं को वास्तु न समझकर इंसान समझे लेकिन  लिए समाज कितना तैयार  है? और जब तक ऐसा हो उससे पहले उपाय क्या है? और वैसे भी कुछ बुरे लोग तो समाज में फिर भी रहेंगे ही.जाहिर है हमें और खासकर महिलाओं को अपने बचाव के लिए खुद को तैयार करना होगा भले ही कोई बुरा समय आने पर हिंसा का ही सहारा क्यों न लेना पड़े.
                      आज मैं मानता हूँ की महिलाओं पर हाथ उठाना गलत बात है लेकिन यदि किसी महिला ने अचानक कभी मुझ पर चाकू से हमला कर दिया तब थोड़े ही मैं अपने किसी सिद्धांत से चिपका रहूंगा बल्कि उस समय तो मैं खुद को बचाने की ही कोशिश करूंगा और जरूरी हुआ तो उसे धक्का भी देना पड़े अब इस कारण उसे चोट लगती है तो लगे लेकिन इसे हिंसा को बढ़ावा देना या महिलाओं का अपमान करना कैसे माना जा सकता है.वैसे मैंने सुना है की जहां लड़कियों को आत्मरक्षा का प्रशिक्षण दिया जाता है वहाँ सबसे पहले ये ही सिखाया जाता है की ऐसी कोई स्तिथि आने पर लड़ने की बजाय जोर से चिल्लाना या भागना ही ज्यादा सही है.
                         अब नारीवाद के बारे में ये ही कहूँगा की जब तक पुरुष का विरोध केवल और केवल इसलिए न किया जाए की पुरुष पुरुष है तब तक भी मुझे तो इसमें कुछ गलत नहीं लगता हाँ कई बार किसी के तरीके से जरूर असहमति हो सकती है पहले मैं इस बारे में कोई आपत्ति नहीं करता था पर आजकल कह देता हूँ.कई बार ऐसा भी होता है या कहूँ की मुझे ऐसा लगता है की एक गलत विरोध या गलत तरीके को भी सही बताकर नारीवाद से जोड़ दिया जाता है.मैंने कुछ समय पहले ऐसे लेख और टिप्पणियाँ भी पढी थी और कई लोगों को ऐसी बातें कहते सुना भी जिनमें उन पाकिस्तानी महिलाओं की बहादुरी के भी गीत गाये जा रहे थे जिन्होंने अपने बेवफा प्रेमियों पर तेज़ाब डाल दिया था.पाकिस्तान में इस तरह की कई घटनाएं एक के बाद एक सामने आई थी.लेकिन इन लड़कियों को भी चिंगारी,ज्वालामुखी और न जाने कौन कौनसी उपमाएं दी गई और साथ में पुरुषों को डरकर रहने की नसीहतें भी. और केवल महिलायें ही नहीं बल्कि कई पुरुष भी जोश में लग रहे थे.पर ये सब मुझे बिलकुल गलत लगा.और ऐसा करने से किसीको लग रहा है की पुरुष सुधर जाएगा तो ऐसा कुछ  नहीं है.ये एक वर्ग के खिलाफ हिंसा को ही नहीं बल्कि बदला लेने की भावना को भी जस्टीफाई करना है.आत्मरक्षा के लिए हिंसा भी गलत नहीं है लेकिन बदला लेने को सही नहीं कहा जा सकता खासकर तब जब दूसरा विकल्प मौजूद हो.कल को लड़के भी लड़कियों पर तेज़ाब फेंकने वाली घटनाओं को सही बताने लगें तो किस तर्क से उन्हें गलत साबित किया जाएगा? ऐसा करने से तो जो स्त्री पुरुष अभी सही है वो भी एक दुसरे से बदला लेने की ही सोचने लगेंगे और इसके लिए उनमें कोई अपराधबोध भी नहीं होगा.इसलिए ऐसे उदाहरणों को नारीवाद या नारी सशक्तिकरण से जोड़ना सही नहीं मानता बाकी ख़याल अपना अपना.
                        और अब मुद्दे से थोडा हटकर एक बात की सभी पुरुष भी महिलाओं की विरोध वाली बात से चिढ़ते ही हो ये जरूरी नहीं 'चक दे इंडिया' सभी ने देखी होगी फिल्म का टर्निंग पॉइंट है वह सीन जब लडकियां उन लड़कों की पिटाई कर देती है जिन्होंने उनके साथ छेड़छाड़ की थी या उन्हें अपमानित किया था.आज भी केवल लडकियां ही नहीं लड़कों को भी ये सीन जोश से भर देता है.और मैं खुद इस फिल्म को देखने तभी गया था जब अपने साथ के लड़कों से इस फिल्म और खासकर इस दृश्य की प्रशंसा सुनी.वहाँ माहौल देखकर लगा नहीं कि पुरुष इसे पुरुष के विरोध में ले रहे हैं क्या इस बात का भी कोई सामजिक विश्लेषण संभव है?लेकिन हाँ ज्यादातर की मानसिकता अभी भी वही है की दोष तो लडकी के करेक्टर का या कपड़ों का ही होगा.अभी निकट भविष्य में तो लगता नहीं की ये मानसिकता जाने वाली है.
                         और चलते चलते शीर्षक के बारे में भी बता दूं की जब मैं ये शीर्षक सोच रहा था तब मुझे लग रहा था की कहीं इससे दूसरों को ये न लगे की मैं दूसरों को कुछ सिखाने की कोशिश कर रहा हूँ या खुद को बहुत प्रगतिशील समझ रहा हूँ हो सकता है आपको ऐसा कुछ लगे भी.लेकिन ऐसा है नहीं. पोस्ट का शीर्षक ये इसलिए रखा ताकि पोस्ट की बात इसमें सिमट जाए.बाकी स्थिर मानसिकता होने या बिलकुल सही होने का दावा मेरा कभी नहीं रहा.इस मंच को केवल अपने विचार व्यक्त करने और दूसरों को समझने का जरिया भर मानता हूँ।इस विषय पर पोस्ट इसलिए लिखी क्योंकि जब जब कुछ दिनों से मैं ब्लॉगजगत से दूर था उस दौरान कई ऐसी पोस्ट्स आई जो अब समय मिलने पर पढी लेकिन सब जगह टिप्पणियां देना संभव न था सोचा पोस्ट ही लिख दी जाए.

Sunday, April 29, 2012

अश्लीलता:खुद महिलाओं का नजरिया क्या हैं?



यह तब की बात हैं जब मल्लिका शेरावत फिल्मों में आई ही थी.उनकी एक फिल्म के सेट पर उनसे किसी पत्रकार ने पूछा कि क्या आपको नहीं लगता कि फिल्मों में टू पीस बिकनी पहनना अश्लीलता को बढावा देना हैं,इसके जवाब में मल्लिका ने कहा कि आप मुझसे क्या पूछ रहे हैं उस हीरो से जाकर क्यों नहीं पूछते उसने तो वन पीस ही पहन रखा हैं.जाहिर सी बात हैं इस जवाब के बाद उस पत्रकार के पास पूछने के लिए कुछ नहीं रह गया था.मल्लिका का ये बयान उस समय बहुत चर्चा में रहा था.तब बहुतों को लगा होगा कि मल्लिका एक बोल्ड विचारों वाली आधुनिक महिला हैं. लेकिन इसके कुछ समय के बाद उनकी एक फिल्म मर्डर की शूटिंग चल रही थी इसके लिए मल्लिका को एक टॉपलेस दृश्य देना था जिसके लिए निर्माता महेश भट्ट ने उनकी स्वीकृति पहले ही प्राप्त कर ली थी.लेकिन जिस दिन ये दृश्य शूट किया जाना था तभी ऐन वक्त पर मल्लिका ने ऐसा करने से मना कर दिया.बाद में जब उनसे इसके बारे में पूछा गया तो उनका जवाब था कि हाँ पहले मैं ऐसा दृश्य करने वाली थी लेकिन कहीं न कहीं मुझमें भी वही साधारण और पारंपरिक भारतीय लडकी बैठी हुई हैं जिसने मुझे ऐसा करने से रोक दिया.यानी कि जो महिला अंग प्रदर्शन जैसे विषय पर भी समानता को लेकर इतने बोल्ड विचार रखती हो उस पर भी समाज की ही एकतरफा सोच हावी हैं वर्ना देखा जाए तो पुरुषों द्वारा भी तो टॉपलेस दृश्य करना आम बात हैं शायद ही किसी अभिनेता को इसमें झिझक महसूस हुई हों क्योंकि संस्कारों को कायम रखने की अपेक्षा समाज ज्यादातर महिला से ही करता हैं.
                    एक बार विद्रोही लेखिका तसलीमा नसरीन ने भी अपने किसी लेख में कहा था की मैं बचपन में शुरू से ही सोचा करती थी की जिस तरह मेरा भाई घर में आजादी से रह सकता वैसा मैं क्यों नहीं कर सकती,जिस तरह वह घर में बिना बनियान के केवल निकर में घूम सकता है वैसी आजादी मुझे क्यों नहीं है.क्या सिर्फ इसलिए की मेरी शारीरिक संरचना थोड़ी अलग है?जब मैंने पहली बार ये पढ़ा तो मैं कई देर तक सोच में पड़ गया क्योंकि देखा जाए तो तसलीमा ने ऐसी कोई अनोखी  बात नहीं कही लेकिन इस तरफ हमारा ध्यान क्यों नहीं जाता?ये कितनी स्वाभाविक सी बात है हमें गर्मी लगी तो कुछ देर के लिए शर्ट उतार ली लेकिन यही काम यदी महिला भी कर ले तो कौनसा आसमान टूट पडेगा? लेकिन सच तो ये है की हमारे लिए ऐसे किसी दृश्य की कल्पना करना भी बहुत भयानक है और पुरुष ही क्या खुद महिला भी ये नहीं सोच सकती की वह अपने ही घर में ही अपने पिता या भाई के सामने गर्मी से बचने के लिए ऐसा कोई जतन करे.लेकिन महिलाओं पर ही आपत्ति क्यों?शायद इसलिए की  हमें पुरुषों को ऐसा करते देख देखकर आदत पड़ गई है या शायद इसलिए की पुरुष महिलाओं को अपनी तरह से बेफिक्र रहते देखना ही नहीं चाहते.मुझे लगता है की दोनों बातें सही हैं.यदि हम भी शुरू से ही महिलाओं को पुरुषों की तरह ही ये सब करते देखते तो हमें कुछ भी गलत नहीं लगता और न महिलाओं के छोटे कपडे पहनने या बिना ऊपर का वस्त्र पहने घर में घूमने को अनैतिक समझा जाता.
                 लेकिन ऐसा भी नहीं है की केवल भारतीय समाज में ही ऐसा दोहरा रवैया देखने को मिलता हो बल्कि खुद आधुनिक समझा जाने वाला पश्चिमी समाज भी इससे पूरी तरह तो मुक्त नहीं ही हैं.तभी वहाँ भी गो टोपलेस या slutwalk जैसे मूवमेंट्स होते रहते हैं.लेकिन इतना जरूर है की वहाँ पर हमारी तुलना में उनके पास महिलाओं के कपड़ों के अलावा चिंता करने के लिए और भी विषय हैं.वहाँ पर महिलाओं से छेड़छाड़ और उनकी तरफ घूरना आदी कम होता हैं और महिलाएं भी शायद उतना असहज महसूस नहीं करती जितना हमारे यहाँ.और न ही महिलाओं के साथ होने वाले दुर्व्यवहार के लिए उनके कपड़ों को उतना जिम्मेदार ठहराया जाता है जितना हमारे यहाँ.शायद इसका कारण ये है की वहाँ पुरुष महिलाओं को पहले से ही छोटे कपड़ों में घुमते स्विमिंग पूल किनारे धुप सेंकते देखते रहे हैं इसलिए उनके लिए यह कोई कौतूहूल का विषय नहीं है,बल्कि भारत में भी कई आदिवासी जातियों में महिलायें नाम मात्र के ही वस्त्र पहनती हैं.वहाँ पुरुषों को स्त्री शरीर के उभारों और कटावों को लेकर कोई उत्सुकता नहीं हैं यहाँ तक की स्तनों को भी बच्चे को दूध पिलाने के काम आने वाले अंग से ज्यादा महत्त्व नहीं दिया जाता.वहाँ छेड़छाड़ या बलात्कार जैसे अपराधों के बारे में भी कभी नहीं सुना जाता.यानी कपडे कोई कारण नहीं है जबकि मुख्यधारा के समाज में कपड़ों को लेकर ही सबसे ज्यादा हाय तौबा मचाई जाती हैं.
                              सवाल यही है की महिलाओं के कपडे ही हमारे लिए इतने महत्तवपूर्ण क्यों हैं की उनके आधार पर ही उनको चरित्र प्रमाण पत्र दिया जाता है जबकि पुरुषों के लिए ऐसा कोई मापदंड कभी नहीं रहा?एक बात और नहीं समझ आती की केवल महिलाओं के सन्दर्भ में ही स्त्री अशिष्ट रुपण अधिनियम जैसा कानून क्यों बना हुआ हैं?क्या हम मानकर चल रहे हैं की गरीमा सिर्फ महिलाओं की ही होती है जिसे बचाए जाने की बहुत जरूरत हैं?तो फिर यदी पुरुष भी केवल महिलाओं के ही अंग प्रदर्शन पर ही उंगली उठाते हैं तो इसमें आश्चर्य कैसा,कैसी आपत्ति? क्योंकि वो तो पहले से ही केवल महिलाओं पर ही मर्यादा,इज्जत आदी भारी भरकम शब्द लादकर मनमानी करते आये हैं.मेरा उद्देश्य किसी कानून या मान्यता को गलत ठहराने का नहीं है लेकिन मैं जानना चाहता हूँ की ऐसा क्यों हैं.
                अभी हाल ही में एक अदालत ने फिल्म हेट स्टोरी के पोस्टरों को अश्लील  बताकर बैन करवा दिया था.यहाँ ब्लॉग पर भी एक पोस्ट में इसी फिल्म के एक पोस्टर पर कईयों ने आपत्ति की थी की यह पोस्टर अश्लील हैं.इस पोस्टर में नायिका की पीठ को पूर्णतः निर्वस्त्र दिखाया गया था.मैं मानता हूँ की इस पोस्ट में ऐसी तस्वीर की कोई जरूरत नहीं थी वैसे भी यहाँ नेट पर बहत से बच्चे भी आते हैं अतः ऐसा करने से बचना चाहिए क्योंकि हर चीज के लिए एक सही उम्र होती हैं.लेकिन मैं इस बात पर दुविधा में हूँ की इस तस्वीर को अश्लील माना जाए या नहीं.क्योंकि बहुत से पुरुष कलाकारों की भी तो ऐसी तस्वीरें छपती रहती हैं जिसमें पीठ क्या सीना भी नग्न दिखाया जाता हैं.यदी सलमान की कोई बिना शर्ट वाली तस्वीर वहाँ पोस्ट में डाल दी जाती तो क्या हमें वह भी अश्लील लगती?ये बात ठीक है की कई ब्लॉगर दूसरों का ध्यान खींचने के लिए भी इस तरह की तस्वीरें पोस्ट में डाल देते हैं उनका विरोध होना चाहिए लेकिन ये कैसे  तय किया जाएगा  की कौनसी तस्वीर या द्रश्य अश्लील हैं और कौनसा नहीं?हाँ पब्लिसिटी  के लिए कोई ऐसा करता है तो उसका विरोध होना चाहिये.
                     इसी तरह 'इण्डिया टुडे' के नवीनतम अंक में कवर स्टोरी पर भी बवाल मचा हुआ हैं जिसके मुख प्रष्ठ पर एक तस्वीर छापी हैं जिसमें एक महिला अपने हाथों से अपने अनावृत वक्ष को छुपाये हुए हैं.कवर स्टोरी भारतीय महिलाओं में सौन्दर्य की चाह में ब्रेस्ट सर्जरी के बढ़ते चलन को लेकर हैं.और शीर्षक 'उभार की सनक' जैसा कुछ दिया गया हैं.कई लोगों को आवरण प्रष्ठ पर दिए गए चित्र पर आपत्ति है परन्तु मुझे तो इसमें कुछ ख़ास बात बात नही लगी.यदी शीर्षक ही ऐसा है तो चित्र किसी गुलदस्ते या इन्द्रधनुष का तो होने से रहा.पर एक बार मान लीजिये की आवरण कथा लड़कों में डोल्ले शोले बनाने ले लिए जिम जाने के बढ़ती प्रवृति को लेकर होती और कवर पृष्ठ पर जोन अब्राहिम की मांसपेशियां दिखाती कोई तस्वीर होती तो क्या उस पर भी हंगामा मचता ? जोन को तो तब अपना सीना छुपाने की भी जरुरत नहीं पड़ती.
                पुरुष यदी महिलाओं के चित्रों आदी पर आपत्ति करता हैं तो माना जा सकता है की वह खुद अपने को बंधन मुक्त रख  महिलाओं को संस्कारों के नाम पर बांधें रखना चाहता हैं.ताकि महिलाओं को खुद अपने बारे में सोचने की ही फुर्सत न मिलें.लेकिन खुद महिलायें और खासकर वो महिलायें जो समानता जैसे मूल्यों में विश्वास रखती हैं और पित्रसत्ता  की बारीक बुनावट को भी समझती हैं वो इस बारे में क्या सोचती हैं?क्या उन्हें भी सलमान,जोन या शाहिद की बजाय केवल  महिलाओं की ही ऐसी तस्वीरें अश्लील लगती हैं?कहीं ऐसा तो नहीं की ये महिलायें भी किसी दूसरी महिला को कम कपडे या बिकिनी जैसे परिधानों में देखकर ये तो नहीं सोचती की ये महिलायें उनकी(स्त्रियों की) गरीमा को कम कर रही हैं?इसके लिए मुझे तमाम महिलायें माफ़ करें लेकिन कभी कभी मुझे लगता है की महिलाओं को भी अपनी उस पारंपरिक और लगभग पवित्र छवि से मोह हो गया है जो उनके लिए कभी पुरुषों ने गढ़ी थी जबकि वो खुद ही ये भी कहती हैं की कपडे कोई मापदंड नहीं होना चाहिए.पुरुषों का बचना तो मुश्किल हैं ही लेकिन सच तो ये हैं की खुद महिलायें भी इन सवालों से बच नहीं सकती बल्कि ये सवाल उनके सर पर भी भूत बनकर नाचते रहेंगे.नहीं.... मैं किसी की सोच को गलत नहीं बता रहा हूँ और न ही मुझे इसका कोई हक़ है लेकिन जानना चाहता हूँ की इसके पीछे कारण क्या हैं और मेरा सोच गलत हैं तो आप कृपया मुझे सही करें वैसे भी यहाँ किसीकी सोच या निर्णय अंतिम कहाँ होता हैं.
                    महिलायें कह सकती हैं की अंग प्रदर्शन करने वाली महिलाओं की बजाय वे पुरुषों की भोगी व वासनात्मक प्रवर्ति का विरोध करती हैं.यदि ऐसा हैं तो ये बात अच्छे अन्न की भांति सराहनीय हैं.ऐसा होना चाहिए और शायद हो भी रहा है लेकिन एक बार सवाल फिर से दोहरा दूं की इसके लिए उन चित्रों को अश्लील क्यों कहा जाए?यहाँ तो दोष पुरुष की दृष्टी का हैं लेकिन क्या चित्र को अश्लील बताकर या खुद महिला पर ही उंगली उठाकर हम उन्हीं पुरुषों का ही तो पक्ष मजबूत नहीं कर रहे जो समाज में महिला के प्रति बढ़ते छेड़छाड़ या बलात्कार जैसे अपराधों के लिए महिलाओं द्वारा अंग प्रदर्शन को ही जिम्मेदार ठहराते हैं.
                        और जहां तक बात हैं पुरुषों द्वारा आपत्ति का सवाल है की कोई मल्लिका या पूनम पाण्डेय स्त्री की गरीमा को कम कर रही हैं या इनकी वजह से महिलाओं का सम्मान कम हो जायेगा तो उन्हें भी ये सोचना चाहिए की ग्लेमर जगत में इमरान हाशमी से लेकर सलमान या मिका तक सभी ये ही तो कर रहे हैं तो क्या इनकी वजह से महिलाओं ने हमारा सम्मान करना बंद कर दिया फिर कुछ महिलाएं भी यही सब कर रही हैं तो इससे हमें क्यों फर्क पड़ना चाहिए और हम उन्हें महत्त्वा ही क्यों दें?
                और वैसे भी जहाँ महिलायें घूंघट या बुर्के में रहती हैं वहाँ क्या उनका बहुत सम्मान किया जाता हैं और क्या उन्हें वहाँ बराबरी के सारे अधिकार हासिल हैं?ये सब भी तो महिलाएं करके देख चुकी हैं लेकिन सच तो ये है की सम्मान तब होगा जब पुरुष मन से ऐसा चाहेंगे वरना महिलायें कुछ भी कर लें पुरुषों की सोच महिलाओं को लेकर नहीं बदलने वाली.फिलहाल तो सबसे ज्यादा जरूरी यही है की कोई कैसे कपडे पहने या कैसे नहीं और कितना शरीर दिखाए या कितना नहीं इसमें किसी दुसरे का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए.शरीर जिसका है वही इसके बारे में तय करें.समय के साथ कई चीजों को लेकर सोच बदलती रहती हैं जैसे कुछ साल पहले तक किसी महिला के स्लीवलेस कुर्ता या जींस आदी पहनने पर ही दूसरों की नजरें टेढ़ी हो जाती थी खुद महिला भी भीड़ में असहज महसूस करती थी पर अब ऐसा कम ही होता है या होता ही नहीं हैं.पता नहीं कितना सही हैं लेकिन कई जगह पढ़ा है की अंग्रेजों के आने से कुछ समय पहले तक भारत में कई जगहों पर स्त्री और पुरुष ऊपर का वस्त्र पहनते ही नहीं थे.यदि ऐसा है तो आज ये हालत कैसे हो गई की महिलाओं के कपडे ही हमारे लिए उनके चरित्र का पैमाना बन गए?
जेम्स  बोंड महिला विरोधी हैं?
कई लोगों का मानना है की जेम्स बोंड का किरदार महिला विरोधी  हैं.यहाँ तक की होलीवुड  की कई नायिकाएं भी इसी कारण जेम्स बोंड की फिल्मों में काम करने से मना कर चुकी है.क्योंकि उनका मानना है की जेम्स बोंड को महिलाओं के जज्बातों की क़द्र नहीं हैं वह अपने काम निकलने के लिए उन्हें मोहरा बनता हैं और फिर उनसे किनारा कर लेता हैं यहाँ तक की वह अलग अलग देशों में जाता है और अपने अहम् की संतुष्टी के लिए कई महिलाओं के साथ बेड साझा करता हैं.लेकिन मुझे ये नहीं समझ आता की हम शारीरिक संबंधों जिनमे महिला और पुरुष की बराबर की भागीदारी  होती हैं वहाँ भी हमेशा पुरुष को शिकारी और महिला को शिकार के रूप में ही क्यों देखते हैं?यही काम तो लारा क्राफ्ट या चार्लीज़ एंजेल्स जैसी फिल्मों में नायिकाएं भी तो करती हैं लेकिन पुरुषों को तो ये शिकायत नहीं होती की उनका इस्तेमाल हो रहा है.कुछ लोग यहाँ छुरी या खरबूजे वाली मिसाल दे सकते हैं लेकिन मैं यही जानना चाहता हूँ की स्त्री को हम खरबूजा ही क्यों मान रहे हैं.इसके अलावा जेम्स बोंड की बोस ही एक महिला है जिसका नाम ऍम हैं और उसके आदेश के बिना जेम्स बोंड कुछ नहीं कर सकता और उसे लगभग हर फिल्म में अपनी ही नायिकाओं से पिटाई खाते हुए भी दिखाया जाता है फिर भी उसे महिला विरोधी  क्यों कहा जाए या हमारी आदत ही हो गई है स्त्री को हर बार इतना कमजोर मानने की जैसे कोई भी पुरुष उसका इस्तेमाल कर सकता है?

Wednesday, March 28, 2012

क्या हम मुसलमानों को आतंकवादी समझते हैं ?

यह  सवाल कोई पहली बार मन में आया हो ऐसा नहीं हैं बल्कि कई मौकों पर जब मुस्लिमों के प्रति भेदभाव या उन्हें मुख्यधारा  में लाने की बात की जाती है तब ये बात अक्सर उठाई जाती है की मुस्लिमों को आतंकवादी क्यों समझा जाता है या उन पर शक क्यों किया जाता हैं.किसी आतंकवादी घटना या बम ब्लास्ट आदी के बाद तो अक्सर कई लोगों द्वारा पहले ही अपील की जाने  लगती है की पूरी कौम को बदनाम  मत कीजिये या आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता आदी आदी.परन्तु क्या सचमुच हम ऐसी घटनाओं के बाद मुस्लिमों पर शक करना शुरू कर  देते हैं या उन्हें आतंकी ही मानने लगते हैं?
            कुछ लोग सचमुच ऐसा करते होंगे पर पता नहीं क्यों मुझे हमेशा लगता है की ये बातें  कुछ ज्यादा ही बढ़ा चढ़ाकर की जाती है इस हद्द तक की मुस्लिम समाज खुद को सचमुच असुरक्षित महसूस करने लगे.वैसे आज हिन्दू मुस्लिम कोई बहुत प्रेम से भले ही न रह रहे हों लेकिन ये भी सच है की अब ये कुछ ख़ास लड़ भी नहीं रहे है बल्कि पहले की अपेक्षा अब दूरियां कम ही हुई हैं.देखा जाए तो अब सभी साथ खाते पीते,उठते बैठते  और काम धंधा करते हैं.हिन्दू हों या मुस्लिम दोनों ने ही अब धर्म के नाम पर राजनीति करने वालों को भाव  देना बंद कर दिया हैं.भाजपा को उग्र हिंदुत्व  का रास्ता छोड़ना पड़ा है,संघ अपने घटते स्वयंसेवकों की वजह से चिंतित है तो वहीँ मुस्लिमों ने भी तुष्टीकरण की राजनीति करने वालों की बजाय विकास की  बात करने वालों को तरजीह देना शुरू कर दिया है.हालिया उत्तर प्रदेह विधानसभा चुनावों में मुस्लिम आरक्षण या बाटला हाउस एनकाउन्टर जैसे मामले उठाकर मुस्लिमों की सहानुभूति(और वोट भी) बटोरने के कांग्रेस प्रयासों पर वहाँ के मुसलामानों ने पानी फेर दिया हैं.और ये सब एक तरह से लोकतंत्र के लिहाज से अच्छा ही है.लेकिन फिर भी ये बात तो सच है की मुस्लिमों के साथ विभिन्न स्तरों पर भेदभाव होता है और खूब होता है.लेकिन क्या ऐसा केवल उनके मुसलमान होने की वजह से ही है या ये सब क्या केवल मुसलमान ही सह रहे हैं?मुझे लगता है की इस  तरह के भेदभाव के शिकार और भी बहुत से लोग हैं न की केवल मुसलमान.और मुझे नहीं लगता की मुसलामानों के साथ भेदभाव केवल उनके अलग धर्म के कारण हो रहा है,फिर चाहे वह पुलिस द्वारा निर्दोषों को सताने की बात हो या बैंकों द्वारा खाता  खोलने या ऋण देने में आनाकानी करने की बात हों या मुस्लिमों को किराए पर मकान या कमरा देने से मना करने का मसला हो.
              पहली बात तो ये की आम गैर मुस्लिम भारतीय मुसलामानों को आतंकवादी नहीं मानता है.हाँ कुछ लोग गलत हैं जो की कहीं  भी हो सकते है खुद मुस्लिमों में बहुत से ऐसे होंगे जो दूसरों से नफरत करते होंगे या उन्हें काफिर मानते होंगे.जहाँ तक बात है मुसलामानों को आतंकी बताने की तो मेरे ख़याल  से किसीको आतंकी कहने या कट्टरवादी  कहने में बहुत फर्क है.कुछ इस्लामिक रिवाजों और उनके कठोरता से पालन के कारण मुस्लिमों को कट्टर समझा जाता है न की आतंकी.आमतौर पे मुस्लिमों के बारे में लोगों की ये धारणा रहती है की वो धर्म को हर मामले में पहले ही रखते है जो की मेरे हिसाब से पूरी तरह गलत भी नहीं हैं.आप कह सकते हैं की कुछ और समुदाय भी धार्मिक रिवाजों का कठोरता से ही पालन करते हैं जैसे की जैन धर्म को मानने वाले लोग नियम कायदों के पक्के होते हैं.लेकिन मुसलामानों में बुरका,खतना,पांच बार नमाज,रोजे,मांसाहार यहाँ तक की कुछ त्योहारों पर घर पे ही जानवरों को हलाल करने आदि कुछ बातें ऐसी हैं जो उनकी  एक कट्टर छवि ही पेश करते हैं (लेकिन स्पष्ट करना चाहूँगा की  यहाँ मैं रिवाजों के सही या गलत होने की बात नहीं कर रहा हूँ,वो एक अलग मसला है).यही कारन है की मुस्लिमों की छवि ही ऐसी बन गई है.लेकिन ये भी सच है की जैसे  जैसे मुस्लिम आगे आ रहे है उनके प्रति लोगों का दृष्टिकोण भी बदल रहा है.
              फिर भी यदि कोई मुस्लिमों को समझने या उनके प्रति सोच बदलने या स्वस्थ दृष्टिकोण अपनाने का  आह्वान करता है तो मुझे भावना के स्तर पर कोई असहमति नहीं है वरन समर्थन है लेकिन ये इस तरह से न हो की सामने वाला खुद को उपेक्षित समझने लगे और दूसरों को अपना दुश्मन.जबकि आमतौर  पर खुद मुस्लिम ऐसा तरीका नहीं अपनाते.
              अभी एक मामला सामने आया है.दिल्ली में इस्रायली दूतावास की कार में विस्फोट के मामले में एक पत्रकार सैयद मोहम्मद काजमी को गिरफ्तार किया गया है.वहीं कुछ अति उत्साही धर्मनिरपेक्षतावादियों ने पहले ही पुलिस पर आरोप लगाना शुरू कर दिया हैं की काजमी को  बेवजह परेशान किया जा रहा है.हालांकि जिस तरह की ख़बरें मीडिया में आई है उससे ये मानना मुश्किल है की काजमी बेकसूर है.वहीं उनका पक्ष लेने वालों ने कोई ठोस कारण भी नहीं दीया जिससे लगे की पुलिस यहाँ गलत है.खैर  होने को कुछ भी हो सकता है देखते है आगे क्या होता है.लेकिन फिर भी मेरा इस बात से कोई इनकार नहीं है की पुलिस में बहुत से ऐसे लोग है जो मुसलामानों के प्रति दुराग्रह रखते है और कई बेक़सूर मुसलामानों को सताया भी जाता है जांच के नाम पर.लेकिन फिर सवाल ये ही है की पुलिस किसकी सगी है?उसे तो कई  बार ये दिखाना ही होता है की देखो काम हो रहा है फिर चाहे निर्दोषों को ही गिरफ्तार क्यों न करना पड़े.इफ्तिखार गिलानी,सीमा आजाद और उनके पति से लेकर विनायक सेन तक लम्बी लिस्ट है.जरा नक्सलवाद और माओवाद प्रभावित इलाकों में जाकर देखा जाए की पुलिस निरीह  आदिवासियों के साथ कैसे पेश आती है.यही नहीं दिल्ली,राजस्थान और म.प. जैसे राज्यों में कई इलाके ऐसे हैं जिन्हें अब 'मिनी बिहार' कहा जाने 
 लगा है क्योंकि यहाँ बिहार और उड़ीसा से आये मजदूर बहुत बड़ी संख्या में रहने लगे है.इन इलाकों के आस पास कोई चोरी या हत्या की घटना होती है तो पुलिस किसी भी बिहारी को शक के आधार  पर ही थाने ले जाती है और प्रताड़ित करती है.गाँव में दलितों के साथ पुलिस क्या करती है बताने की जरुरत नहीं.ये लोग भी अपमानित होने के बाद कुछ नहीं कर पाते.न जाने अब तक कितने लेखक,पत्रकार,सामजिक कार्यकर्ताओं को पुलिस ने झूठे आरोप लगाकर फंसाया है.ये मामला पुलिस के चरित्र  का  है.पुलिस सभी के लिए उतनी ही बुरी और असंवेदनशील है न की सिर्फ मुसलामानों के लिए.और कुछ आतंकी घटनाओं में हिन्दू आतंकी भी पकड़ में आये हैं.जाहिर सी बात है इसके लिए दूसरों से भी पूछताछ की गई होगी उन पर भी शक किया गया होगा.
               बैंकों परे भी  आरोप लगाया जाता है की मुस्लिमों के खाते खोलने और उन्हें ऋण दिने में आनाकानी करते है.ये बात एकदम से हजम होने वाली नहीं है अगर मुसलमानों को बात इस तरीके से कही जाये तो क्यों न उनको लगे की  हमसे भेदभाव बरता जाता है.बैंक और खासकर निजी बैंक तो अपने व्यावसायिक हितों को ही सबसे ऊपर रखते है.फिर उन्हें ग्राहक के धर्म से क्या लेना देना?हो सकता है कई बार मुस्लिम इस्लामिक उसूलों में आस्था  के कारण ब्याज वाला कोई लाभ न लेना चाहते हों और इसी कारण खाता खुलवाने या बैंक की दूसरी योजनाओं क लाभ लेने के लिए वो स्वयं आगे न आते हों?वहीं लोन तो किसीका भी अस्वीकृत हो सकता है जैसा की ये बात तो बैंक खुद मानते है की कमजोर आर्थिक स्थिति के चलते कई बार मुसलामानों को भी ऋण देने से मना कर दिया जाता है जो की किसाथ भी हो सकता है बल्कि कई बार तो अच्छी आर्थिक स्थिति के बावजूद ऍफ़.आई. नेगेटिव हो जाती है.धर्म इसमें क्या करेगा?फीर भी हो सकता हैं गाँव में कुछ सरकारी बैंक मुसलामानों से  भेदभाव करते हो लेकिन मेरा व्यक्तिगत अनुभव है के गाँव में हर क्षेत्र में दलितों के साथ कही ज्यादा भेदभाव होता है जबकि मुसलामानों के साथ एक दूरी तो बरती जाती है पर भेदभाव उतना नहीं होता.यहाँ तक की एक स्वर्ण और मुसलमान एक दुसरे के शादी जैसे अवसरों पर भी आते जाते हैं जबकि दलितों को अडने ही नहीं दिया जाता स्कूलों में भी दलितों के बच्चों  के साथ ज्यादा दुर्व्यवहार किया जाता है.
              एक बार और अक्सर सूनी जाती है की मुसलामानों को कमरा किराये पर नहीं दिया जाता है.तो भाई इसका कारण भी केवल दुसरे धर्म क होना ही नहीं है.यहाँ तो कई बार एक ब्रह्मण राजपूत को रूम नहीं देता है तो कई बार राजस्थानी किसी बंगाली को किराये पर नहीं रखता.बताइए क्या किया जाए?....कई खुद मुस्लिम ये चाहते है की किसी मुस्लिम के घर या मुस्लिम बस्ती में ही रहा जाए.कई परिवार तो ऐसे है जो सिर्फ मांसाहारी होने की वजह से किसीको भी किराये पर नहीं रखते.ऐसा नहीं है की केवल आतंकवादी समझकर  ही रूम नहीं दिया जैसा की कई लोगों द्वारा प्रचारित किया जाता है.वहीं बहुत से लोग ऐसे भी है जिन्हें मुस्लिमों को किराये पर रखने में कोई दिक्कत नहीं होती जिनमें से एक हम भी हैं.इसलिए सच केवल उतना ही नहीं हैं जितना की बताया जा रहा हैं.
कश्मीरियों क दर्द नहीं समझते?
इस विषय को भी धर्म  के चश्मे से ही देखा(और दिखाया भी) जाता है.मैं इस बात से सहमत हूँ की हम कश्मीरियों के प्रति असंवेदनशील हैं जबकि उन्हें सैनिक शाशन में रहना पड़ रहा है जहाँ आये दिन कर्फ्यू लगा रहता है.लेकिन क्या इसका कारण अधिकाँश कश्मीरी जनता का मुस्लिम होना है?और हम किसके प्रति संवेदनशील है?पूर्वोत्तर के लोगों,महाराष्ट्र के आत्महत्या को मजबूर किसानों,बुंदेलखंड के सूखा प्रभावित लोगों में से किसके प्रति हमने विशेष सहानुभूति दिखाई है?भारत की ज्यादातर जनता खासकर युवा कश्मीर को केवल उसी रूप में जानते  है जैसा की फिल्मों में दिखाया जाता हैं जहाँ हीरो हेरोइने पिकनिक मनाने जाते हैं और बर्फ से खेलते हैं,गाना गाते है.इसके अलावा बस उन्हें ये पता है की पकिस्तान वहां आतंकियों को भेजता रहता है जिनसे सेना को निपटना होता है.इसके अलावा न उन्हें कश्मीरियों से विशेष लगाव है(या नफरत है) और न ही कश्मीरी पंडितों से.हां धर्म की राजनीति करने वालों की बात अलग हैं.
             बहुत से कश्मीरी आज भी देश के अलग अलग कोनों में रह रहे हैं जिनमें ज्यादातर युवा हैं,कुछ पढ़ाई करते हैं,कुछ छोटी मोटी नौकरी करते हैं तो कुछ कश्मीरी शॉल  आदी बेचने क काम करते हैं .कई  कश्मीरी फ़ौजी और उनके रिश्तेदार सिविल में किराये पर रूम लेकर रह रहे हैं यहाँ तक की दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में तो बहुत से कश्मीरी लड़के व्यावसायिक परिसरों में सिक्योरिटी गार्ड तक लगे हुए हैं.क्या हमने इन्हें आतंकी कहकर और मार मार कर भगा दिया?क्या हम इन पर विश्वास नहीं करते?लेकिन वहाँ तो काश्मिरी युवाओं को ये बताया जा रहा है की तुम बाहर कमाने जाओगे तो तुम्हे आतंकवादी बता दिया जाएगा,लोग तुम्हें मारेंगे.अब ऐसे में नफरत पैदा नहीं होगी तो और क्या होगा?इसमें हमारे साथी वामपंथी सबसे  आगे हैं(जो हुसैन की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की तो वकालत करते हैं पर तसलीमा के लेखन के 'बाज़ार पक्ष' पर गौर करने की सलाह मुफ्त में देते हैं. ).अरे कुछ लोग हर जगह गलत होते हैं.कश्मीर में  कौनसे सब के सब संत ही हैं?
           अंत में ये ही कहना चाहूँगा की ऊपर लिखी सारी बातों क अर्थ ये नहीं की  हमारे भीतर  सुधार  की कोई जरुरत नहीं हैं या हमारे  बीच गलत लोग हैं ही नहीं .यदि कोई मुस्लिमों के प्रति गलतफहमी दूर करना चाहता है तो उसका स्वागत हैं.शिकायत केवल उनसे है जो एक बैलेंस बनाकर नहीं रखते.ये नहीं की बस...'हाय मुसलामानों को जीने दो' वाले नारे लगाने शुरू कर दिए जाए इससे तो अल्पसंख्यक खुद को एक निश्चित खांचे में ही बंद करके रखेंगे.'धर्म खतरे में हैं' जैसा नारा हिंदुत्वा या इस्लाम के नाम पर अपना उल्लू  सीधा करने वाले अक्सर लगाते है लेकिन मुझे नहीं लगता की अब इससे कुछ ख़ास फर्क पड़ता हैं.उदाहरण के लिए आज गिलानी या गिरिराज किशोर एक दुसरे के धर्म या उन्हें मानने वालों के बारे में कुछ कहें तो तो हिन्दू या मुसलमान कोई ख़ास ध्यान नहीं देंगे.लोग इन्हें गंभीरता  से लेंगे ही नहीं.लेकिन जो लोग सेकुलर हैं या जो हर धर्म को ही अफीम मानते हों कम से कम वो तो एक संतुलन  बनाकर रखें क्योंकि उनकी बात ज्यदा ध्यान से सूनी जाती हैं.अभी तो एक समुदाय को  दबा कुचला बताया जा रहा है जबकि दुसरे को उसके दुश्मन के रूप में पेश किया जा रहा हैं इससे समस्या सुलझेगी या और ज्यादा बढ़ेगी?