Sunday, October 16, 2011

अंतरजाल पर हावी भीडतंत्र


                                 हाल ही में कश्मीर पर प्रशांत भूषण द्वारा लापरवाही भरे बयान के बाद हुए कायराना हमले और इससे पहले दिग्विजय सिँह द्वारा 22 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने के बाद इंटरनेट के सकारात्मक और नकारात्म प्रभावों को लेकर बहस फिर तेज हुई है.क्योंकि दोनों ही मामले कहीं न कहीं इंटरनेट के दुरुपयोग से जुडे हुए है.
वैसे तो मिस्त्र ट्यूनिशिया और इंग्लैण्ड के विरोध प्रदर्शनों के बाद से ही दुनियाभर में अंतरजाल पर सोशल साईटों के बढते प्रभाव को लेकर चर्चा हो रही है.हालाँकि भारत में इंटरनेट यूजर्स की संख्या अपेक्षाकृत कम है लेकिन ऐसा भी नहीं है कि हमारे यहाँ अभी तक सब ठीक ठाक ही चलता रहा हो.धर्म के नाम पर एकतरफा और नफरत फैलाने वाले ब्लॉग,ढेरों पोर्न साईटें और ब्लॉग्स यहाँ तक कि खलिस्तान और माओवाद समर्थक प्रोपेगेंडा साईटें पहले से चल रही थी.लेकिन फेसबुक और ऑरकुट के जरिये कभी कभी कश्मीर के लडकों को सुनियोजित तरीके से भडकाकर पत्थरबाजी कराने के अलावा इसका कोई खास गलत असर अभी तक देखने में नहीं आया लेकिन हाँ...ये भविष्य के लिए एक संकेत तो है ही.
लेकिन जैसे जैसे इंटरनेट प्रयोग करने वालों की तादाद बढती जा रही है,सरकार की भी परेशानी बढती जा रही है क्योंकि इससे इन चीजों को और बढावा मिलेगा.इस तरह के स्टंटबाज केवल सरकार को ही नहीं आम आदमी को भी मुसीबत में डाल सकते है खासकर जब धर्म और राष्ट्र के नाम पर भीडतंत्र वाली बातें की जा रही हों.यहाँ तक तो सरकार की भी चिंता जायज है.जब भीड के अनियंत्रित होने और शांतिभंग की आशंका होती है तो वास्तविक जगत में धारा 144 जैसे ऊपाय किये जाते है तो फिर कोई न कोई तरीका साईबर स्पेस में भी आजमाया जाए क्योंकि मामला यहाँ भी उतना ही संवेदनशील है और यहाँ लोग कहीं ज्यादा आसानी से इकठ्ठा हो सकते है और एकतरफा व भडकाऊ प्रलाप कर सकते हैं.पोर्न साईटों या साइबर ठगी के इक्का दुक्का मामलों में पहले भी कार्रवाही होती रही है.पर इस दिशा में सरकार अभी तक सख्त नहीं हुई है हालाँकि 2008 में ही आईटी नियमों में मनचाहे संशोधन कर सरकार इंटरनेट उपयोगकर्ताओं पर लगाम कसने की तैयारी कर चुकी है.यहाँ तक कि 11 साईटों को बिना कारण बताएँ बंद भी किया जा चुका है.हो सकता है आगे और सख्ती करनी पडे.
मगर क्या वास्तव में सरकार की परेशानी का कारण उपरोक्त ही है?ऐसा लगता तो नहीं.दरअसल पारंपरिक मीडिया के सरकार और पूँजीपतियों के हाथ का खिलौना बन जाने के बाद इन्टरनेट एक वैकल्पिक मीडिया के रूप में सामने आया है जो बहुत हद तक दबाव से मुक्त है.यही कारण है की जिन मुद्दों से मुख्यधारा का मीडिया बचता रहा है या जिन पर उसका रवैया तटस्थ रहा है पिछले दिनों उन्हें ब्लॉग और सोशल साइटों पर लगातार उठाया जाता रहा है.महंगाई या भरष्टाचार के मुद्दे हों या पूर्वोत्तर या कश्मीर के सवाल हो,आम आदमी को अपनी आवाज उठाने को  इन्टरनेट के जरिये एक अच्छा मंच मिल गया है.एस.गुरुमूर्ति और डॉ. सुब्रह्मनियम स्वामी के खुलासों को पहले इसी माध्यम के द्वारा जनता के सामने लाया गया यहाँ तक की टूजी घोटाले से जुड़े कई तथ्य भी पहले नेट पर प्रसारित किये जाते रहे उसके बाद मीडिया ने उन्हें जगह दी.टीम अन्ना का आन्दोलन तो साइबर वर्ल्ड से ही परवान चढ़ा.इसके अलावा भूमि अधिग्रहण नीति,आदिवासियों के प्रति सरकारी रवैया और विनायक सेन प्रकरण पर तो हाल ही में लिखा गया.और भी कई मुद्दे बीच बीच में उठते रहे हैं जिन पर निष्पक्ष बहस की उम्मीद मुख्यधारा के सरकारी और गैर सरकारी मीडिया से नहीं की जा सकती.अतः ये कहना सही नहीं होगा की केवल प्रोपेगेंडा करने वालों से ही सरकार को परेशानी है.
                                    वैसे भी सरकार अपने खिलाफ लोगों को जागरूक करने वालों को परेशान करती रही है.आज कांग्रेस टीम अन्ना को भी उसी तरह परेशान कर रही है जैसे कभी तहलका वालों को बी.जे.पी. ने  किया था.दिग्विजय सिंह द्वारा २२ लोगों के खिलाफ शिकायत को भी इसी श्रेणी में रखा जा सकता है क्योंकि उनके बयान खुद लोगों को उकसाते है.कुछ समय पहले शिवसेना ने भी बेंगलुरू के अजित डी. नामक युवक पर केस कर दिया था.उस पर आरोप लगाया गया की उसने शिवसेना के खिलाफ लोगों को भड़काया और एक कम्युनिटी बना कई लोगों को पार्टी के खिलाफ टिप्पणी करने के लिए उकसाया.नितीश सर्कार ने तो अपने ही दो कर्मचारियों को इसलिए निलंबित कर दिया की उन्होंने फेसबुक पर सरकारी भ्रष्टाचार खिलाफ कुछ लिख दिया था.इन सब उदाहरणों से तो लगता है की सरकार अपने खिलाफ उठने वाली आवाजों को दबाना चाहती है न की उन लोगों को जो वास्तव में इन्टरनेट का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं.
                                        वैसे मेरा तो मानना है की अभी इन्टरनेट पर किसी भी वजह से किसी भी तरह की सेंसरशिप थोपने की जरुरत नहीं है क्योंकि प्रोपगेंडा करने वाले या भड़काऊ लेख लिखने वाले अभी अलग थलग पड़े हुए हैं और ज्यादातर लोग अभी ख़बरों की भूख मिटाने या दोस्तों से बतियाने या फिर दुसरे हलके फुल्के विषयों पर ही लिखने के लिए इस माध्यम से जुड़े हुए हैं.लेकिन हमें खुद इस तरह के प्रयास करने होंगे की हम सरकार को और अधिक सख्त होने का बहाना नहीं दें.इसके लिए हम खुद अपने स्तर पर क्या कर सकते है ये ज्यादा महत्तवपूर्ण है.सबसे पहले तो हम ऐसे  ब्लोगों और साइटों से खुद ही दूरी बनाकर रखें.अपनी किसी पोस्ट या टिप्पणी में इनका लिंक न दें.और न प्रोपगेंडा करने वालों के फोलोवेर बन इन्हें और उत्साहित करें.बल्कि हो सके तो दूसरों को मतलब हमारे दोस्तों या परिवार में से कोई ऐसा करे तो उन्हें भी ऐसा करने से रोकें यदी आपसे छोटे है तो ये ज्यादा जरुरी है.
                                         प्रोपगेंडा करने वालों या धर्म,किसी व्यक्ति या संगठन के बारे में दुर्भावनापूर्ण या एकतरफा लेख(आलोचनात्मक नहीं ) लिखने वालों की मानसिकता बिलकुल अलग होती है.इन्हें लगता है मानो ये कोई बहुत बड़ा वैचारिक और सार्थक आन्दोलन चला रहे है.p.b. पर हमला करने वालों ने पहले इन्टरनेट पर ही भरपूर समर्थन जुटा लिया था.इन्हें केवल इनके समर्थन में इनके ब्लॉग पर गए लोग ही दिखाई देते हैं और यदी इनकी संख्या धीरे धीरे बढ़ती रहती है तो इन्हें लगता है मानो सारा देश ही इनका समर्थन कर रहा है.हममें से ही कुछ ने वहाँ  इनका समर्थन कर यहाँ तक की फोलोवर बन इनका उत्साह बढाया है.इससे हमें बचना चाहिए.ऐसे लोग आगे भी साइबर जगत में रहेंगे लेकिन हमारी कोशिश होनी चाहिए की हम खुद आग में घी डालने का काम न करें.और कुछ न हो तो कम से कम इतना तो कर सकते है न की अपने ब्लॉग पर आने वाली आपत्तिजनक और दुर्भावनापूर्ण टिप्पणियों को हटा दें कई लोग ज्यादा ही लोकतान्त्रिक होने के चक्कर में इन्हें भी सजाकर रखते हैं.और यदी हम इतना भी नहीं कर सकते तो सरकारी सेंसरशिप झेलने को तैयार रहें.
जूनियर अडवानी की राजनीति में एंट्री ?
यूँ तो टी.वी. स्टार प्रतिभा अडवानी अपने पिता लालकृष्ण आडवानी के साथ पहले भी रथयात्रा में शामिल रह चुकी है लेकिन इस बार जिस जोशो खरोश के साथ उन्हें आगे किया जा रहा है उसे देखकर ये अटकलें लगाईं जा रही है की आडवानी जी अब अपनी ढलती उम्र को ध्यान में रख अपनी लाडली का राजनीतिक करिअर बनाने की तैयारी कर रहे है.आडवानी पी.एम्. बने या न बने पर शायद उन्हें लगता है की जूनियर अडवानी की लांचिंग का ये सही समय है.रथयात्रा के लिए प्रतिभा अडवानी का तैयार किया हुआ थीम सोंग लोगों को खूब पसंद आ रहा है.जिस तरह वे इस बार जनता के बीच जाकर मिल रही है उससे बाकी के कार्यकर्ताओं ने अटकलें लगानी शुरू कर दी है.वैसे आपको क्या लगता है ?

5 comments:

anshumala said...

अच्छा बदला लिया मुझससे राजन जी मेरी पोस्ट के कारण आप की कश्मीर वाली पोस्ट बेकार चली गई तो बदले में ये पोस्ट लिख डाली मेरे उपवास -३ वाली पोस्ट लगभग बेकार कर दी :)

अभी ये कहना जल्दबाजी है की इन सोशल साईट से कितना और किसे फायदा है और कितना और किसे नुकशान अभी तो इसके दोनों रूप कुछ कुछ सामने आये है अभी इसे और बड़े रूप में देखना बाकि है | पर नुकशान कितना भी हो मुझे नहीं लगता है की अब इन्हें किसी भी प्रकार से रोका जा सकता है ( वैसे सरकारों के बारे में कहा नहीं जा सकता है जब पूरी दुनिया की सरकारों पर बन आएगी तो वो कुछ भी कर सकती है ) वैसे अब जब इस सोसल साईट के कारण यूरोप में प्रदर्शन हो रहे है तो उन्हें देखना पता नहीं क्यों सुखद लग रहा है अभी तक उन्हें दुनिया के एक कोने में हो रहे आन्दोलन सुखद लग रहे थे पर वह का हल देखा बाकि दुनिया को भी मेरी तरह ही महसूस हो रहा होगा | वैसे अब आज की पीढ़ी को वो पुरानी कहावत समझ आ रही होगी की " रोम जल रहा था और - - - - - - -

राजन said...

anshumala ji,
samay milte hi is par spasht karta hun.
lekin ye.... badla :)

राजन said...

हाँ तो अंशुमाला जी,
आपका कहना सही है.प्रशांत भूषण पर हमले की निंदा करते हुए ही मैंने एक पोस्ट लिखी तो थी लेकिन उसमें ज्यादा जोर मैंने जनमत संग्रह और कश्मीर समस्या पर ही दिया था पर जब आपकी पोस्ट देखी तो लगा आपका कहना सही है.इस विवाद को अभी हवा नहीं देना चाहिए.वो पोस्ट अभी भी मेरे पास पडी है.वैसे पहली बार जाना अपनी पोस्ट बेकार चली जाएँ तो कैसा लगता है :)
और आपसे बदला ??
हा हा हा...
इस लायक हम कैसे हो गए?ये पोस्ट मैं कई दिनों पहले लिखना चाहता था पर किसी कारण से टालता गया.आपको याद होगा मैंने आपकी एक पोस्ट पर भी सरकारी सेंसरशिप की बात की थी.लेकिन जब जगह जगह बग्गा और उसके साथियों का गुणगान होते देखा तो लगा अभी लिख देता हूँ वैसे अभी भी कई बातें कहनी रह गई है.मुझे अंदाजा नहीं था आप इन सब पर लिखना चाहती है.पर मेरे लिखने न लिखने से कोई फर्क नहीं पडता.हम तो बेतरतीब लिखने वाले है.पर आपको लिखना चाहिए और अब तो जरूर.
और हाँ अंशुमला जी,हम पश्चिम की तर्ज पर ही जनता को जागरुक करते है तो कोई बात नहीं सरकार केवल इस वजह से नेट पर कंटेंट को नियंत्रित करने लगे तो हम उस पर दबाव भी बना सकते है,मैं कहना चाहता था कि हम सरकार को और बहाने न दें सख्त होने के.

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

बदलाव का पता तो समय के साथ ही चलेगा पर विचारों की इस अभिव्यक्ति को रोकना अब मुमकिन नहीं.....

राजन said...

आखिरकार इस मामले में वही हुआ जो सरकार चाहती थी.गूगल तो एक ही हेकडी में लाईन पर आ गया.अब यूज़र्स को किसी संवेदनशील विषय पर लिखने से पहले अधिक सतर्क रहना होगा.वैसे फेसबुक पर भी नियंत्रण की बात की जा रही हैं हालाँकि मैं उसका कोई बहुत बडा प्रशंसक नही बल्कि इसके द्वारा अपने यूजर्स की निजी जानकारियों को तृतीय पक्ष को बेच डालने जैसे मूर्खतापूर्ण कदम का विरोधी भी रहा हूँ लेकिन फिर भी अभिव्यक्ति और मेल जोल के लिहाज से यह एक अच्छा प्लेटफॉर्म हैं.पर शायद सरकार नाम की वैम्प से ये भी बचा नहीं रहेगा.